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आज भी गर्व से चौड़ा हो जाता है सीना

Tue, 15 Dec 2015 10:38 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो औरैया
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औरैया। साल 1971 में भारत-पाक के बीच हुए युद्ध में जिले के शूरवीरों का भी गौरवशाली योगदान रहा है। जीत के पलों को याद कर फौजी भाइयों ने अमर उजाला से अतीत की यादों को बांटा। 17 दिनों तक चले युद्ध के बाद 16 दिसंबर 1971 को भारतीय फौज ने पाकिस्तान को शिकस्त देकर तिरंगे को लहरा दिया। उस दिन की याद कर आज भी उन शूरवीरों का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है।
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अजीतमल तहसील क्षेत्र के टकपुरा मुरादगंज निवासी 874 एटी बटालियन के सिपाही यतींद्र मोहन बताते हैं कि 1970 में उनकी पहली पोस्टिंग ऊधमपुर में हुई थी। इसी बीच पाकिस्तान से युद्ध छिड़ गया। द्रास क्षेत्र में ड्यूटी के दौरान उन्हें भी कारगिल रवानगी का हुक्म मिला।

फौज में उनका काम सैनिकों को राशन और हथियार पहुंचाना था। श्री सिंह ने बताया कि आदेश मिलते ही आनन-फानन उनकी टुकड़ी गंतव्य को रवाना हो गई। रवाना होने से पूर्व रास्ते के लिए फौज की ओर से उन्हें नमकीन खुरमा, किसमिस और काली दी गई। काली का मुख्य काम प्यास को कम करना होता है।
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20 साल की आयु में उत्साह पूरे जोश पर था। उधर पाकिस्तान की ओर से गोलाबारी जारी थी। ऐसे में सिर पर सिर्फ एक ही जुनून सवार था कि पाकिस्तान को शिकस्त देकर जीत हासिल करना। 17 दिनों तक लगातार गोलाबारी के बाद 10 हजार फुट की ऊंचाई वाली ब्राचिल की तीन पोस्टों पर सेना ने कब्जा कर तिरंगा लहराया।

इस दौरान उनकी कंपनी के कमांडर एमएस डे ने उनके साहस और निष्ठा को देखते हुए उन्हें संग्राम मेडल और पश्चिमी पदक प्रदान किया। फौज में नौकरी करते हुए उन्हें लगभग डेढ़ साल का समय बीत गया था। इस दौरान उन्हें किसी भी प्रकार की छुट्टी नहीं मिल सकी। दिल में देश सेवा का जज्बा था। इसलिए न घर की चिंता और न परिवार से मिलने की तमन्ना।

श्री सिंह ने बताया कि जब डेढ़ साल बाद एक माह की छुट्टी पर घर पहुंचे तो पूरे गांव को उन्होंने युद्ध के हालत बताए। दूसरे दिन साइकिल से मुरादगंज से करीब 40 किलोमीटर दूर चकरनगर के पास गोपालपुरा पहुंचे। वहां कुछ साथियों के परिजनों को उनकी कुशलता का समाचार दिया।

एयरफोर्स में 5 स्क्वायडन विंग में रडार विभाग में वारंट आफीसर रहे कुंवर सिंह बताते हैं कि उन दिनों जब भारत-पाक का युद्ध शुरू हो गया था तो उन्हें इलाहाबाद पोस्ट कर दिया गया था। यह समय उनके जीवन का सबसे खराब समय था। कहते हैं कि उनकी मंशा देश के लिए दुश्मनों से लड़ते हुए उन्हें परास्त करने की थी, लेकिन हालात ने उनका साथ नहीं दिया।

हालांकि वहां पर भी युद्ध के दौरान सभी लोगों को तैयार रहने के आदेश जारी कर दिए गए थे। 1971 में वह भी अपनी कंपनी के साथ लड़ाई में भाग लेने को तैयार रहे। इस बीच कई बार सायरनों की आवाजें देकर एलर्ट किया गया। लेकिन 17 दिनों तक चले युद्ध में भाग लेने की उनकी हसरत पूरी नहीं हो सकी।

वहीं श्री सिंह बताते हैं कि 1962 की लड़ाई में उन्होंने पूरे जज्बे के साथ काम किया। रडार विभाग में रहते हुए दुश्मन के आने वाले लडाकू जहाजों की पूरी सूचना भारतीय पायलट को उपलब्ध कराते हुए दुश्मन के कई टैंक नष्ट करवाए और दुश्मन के जहाजों को भी नेस्तनाबूद कराया। इसके लिए उन्हें चीफ ऑफ एयरफोर्स स्टाफ कॉमोडेशन का खिताब दिया गया। यह खिताब उस समय एयरफोर्स का सबसे बड़ा खिताब होता था जो उनकी विंग में केवल उन्हें ही दिया गया था।
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