वीडियो शूटिंग के दौरान स्कूल में बनी लैब में प्रयोग करते शिक्षक मनीष । संवाद
- फोटो : AURAIYA
दिबियापुर (औरैया)। करके देखो हो सकता है, करते रहो हो जाएगा, इसी सोच के साथ चलने वाले राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार के लिए चयनित जिले के मनीष कुमार बच्चों को नई राह दिखा रहे हैं। उन्होंने साइंस बिहाइंड मिरेकल शो के माध्यम से अंधविश्वास की जड़ें तोड़ीं। बच्चों में दैनिक गतिविधियों में शामिल विज्ञान की समझ विकसित की। शुक्रवार को दिल्ली से आई टीम ने उनके पढ़ाने के तरीके पर एक मिनट की फिल्म भी बनाई है। टीम ने बताया कि पांच सितंबर को एक मिनट के वीडियो के माध्यम से मनीष की उपलब्धियां व बच्चों के साथ कार्य करने के तरीके को राष्ट्रपति भी देखेंगे।
2019 में राज्य अध्यापक पुरस्कार से सम्मानित गांव परसाद पुरवा के निवासी मनीष कुमार 2013 से जिले के विभिन्न स्कूलों में शिक्षण कार्य कर रहे हैं। उनका कहना है कि दैनिक जीवन में होने वाली घटनाओं को विज्ञान से जोड़कर सिखाया जाए तो निश्चित तौर पर बच्चों में विज्ञान के प्रति रुचि और विश्वास बढ़ता है।
उनके राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार के लिए चयनित होने के बाद पूर्व माध्यमिक विद्यालय शिवगंज ब्लाक सहार सुर्खियों में है। शुक्रवार को दिल्ली से पहुंची टीम ने स्कूल में पूरे दिन शूटिंग की। टीम में शामिल विपिन, विक्रम और कुलदीप ने बच्चों के स्कूल आते समय, मनीष की लैब में प्रयोग करते बच्चों, ग्राउंड में साइंस पार्क की गतिविधियों और गांव में चौपाल लगाकर मनीष का पढ़ाते हुए वीडियो बनाया। गांव में ड्रोन से हो रही शूटिंग को देखने के लिए महिलाएं और युवतियां भी उत्साहित रहीं। (संवाद)
इस तरह जगाई विज्ञान में रुचि
- मनीष ने बताया कि गांव में किसी व्यक्ति को कई दिन तक बुखार आने पर नजर लगने और भूत प्रेत की बात कही जाती थी। गांव के लोग झाड़फूंक के चक्कर में पड़ जाते थे। चावल से भरे लोटे को चाकू से उठाकर नजर लगे होने बात कहते हैं। जबकि यह केवल चावल और चाकू के बीच घर्षण के परिणाम स्वरूप होता है। उन्होंने इसे प्रयोग द्वारा समझाकर बड़ों और बच्चों को वैज्ञानिक पहलू समझाया।
- पीलिया होने पर भी झाड़ फूंक करने वाला व्यक्ति केमिकल के पानी से हाथ धुलवाने से निकले पीले पानी व कागज को जलाकर कान में डालने से होने वाला पीला धुआं दिखाकर लोगों को ठगते हैं। इस चक्कर में लोगों की हालत बिगड़ जाती थी। लेकिन अब लोग इस खेल को जान गए हैं।