औरैया। आधुनिकता के रंग ने होली के रंग को फीका कर दिया है। पहले होली पर मचने वाला हुड़दंग अब फूहड़ता ने ले लिया है। पारंपरिक चहका और चौताल डीजे के धुन में गुम हो चले हैं। गांवों में ढोलक, झाल और मजीरे के धुन पर गाए जाने वाले पारंपरिक फगुआ गीत अब भूली-बिसरी यादें बन कर रह गए हैं।
क्षेत्र के पूर्व प्रधानाचार्य व फाग गायक ओम प्रकाश ओझा कहते हैं कि पहले गांवों में होली शिवरात्रि से शुरू हो जाती थी। लोग किसी के दरवाजे पर बैठने से कतराते थे, पता नहीं कब किधर से रंग-अबीर के अलावा कुछ ऊपर पड़ जाए। वहीं चहका और चौताल को गाने वाली टोली लोगों के दरवाजे सहित गांव के चट्टी चौराहों पर बैठकर फगुआ गाती थी।
ढोलक वादक राम कुमार कहते हैं कि एक समय वो भी था जब बसंत शुरू होते ही मतवालों की टोलियां ढोलक, झाल और मजीरा लेकर दरवाजे पर बैठ जाती थीं, तब चहका और चौताल का दौर शुरू हो जाता था। देर रात तक लोग फगुआ गीतों का आनंद उठाते थे। ढोलक वादक सुरेश शर्मा ने बताया कि आज के आधुनिक दौर में पुरानी परंपराओं का स्थान डीजे ने ले लिया है।