कस्बा फफूंद में शरीफ हाफिज-ए-बुखारी हजरत ख्वाजा अब्दुस्समद चिश्ती का 133वां उर्स मुबारक हर्षोल्लास से मनाया गया। अकीदत और मोहब्बत के साथ सभी को अल्लाह के नेक रास्तों पर चलने की नसीहत दी गई। गैर प्रांतों से आए जायरीनों ने उर्स का लुफ्त उठाया। तीन दिवसीय उर्स का देर रात को समापन हो गया।
दुल्हन की तरह सजी आस्ताना आलिया दरगाह सभी को आकर्षित कर रही थी। सतरंगी रोशनी अलग ही छठा बिखेरती नजर आई। दरगाह परिसर में अल्लाह की इबादत और बंदगी के कार्यक्रम हुए। अनफासुल हसन खां चिश्ती ने कार्यक्रम में मौजूद जायरीनों व अकीकतमंदों की उत्सुकता को शांत किया।
अल्लाह के बताए रास्ते पर चलने को कहा । उर्स के आखिरी दिन औरैया, कानपुर नगर, इटावा, जालौन, उरई, कोलकाता, मुंबई से आए जायरीनों ने मजार पर माथा टेका। हजरत की दरगाह में प्रसाद, शर्बत, अगरबत्ती, धूपबत्ती चढ़ाकर मुरादें मांगी।
शाम ढलते ही महफिले शमां में कव्वाली का दौर चला। सुबह चार बजे हाफिज बुखारी ने कुल शरीफ की फातहा की। साथ ही जायरीनों ने सभी को मुबारकबाद दी।
139 वर्ष पहले फफूंद आए थे हाफिज-ए-बुखारी- कस्बा फफूंद स्थित आस्ताना आलिया समदिया के संस्थापक हजरत सैय्यद अब्दुल समद चिश्ती का जन्म 23 मई 1853 ईस्वी को ग्राम सहसवान, बदायूं में हुआ।फफूंद के सज्जादानशीं मोहम्मद अख्तर मियां चिश्ती ने बताया कि हजरत हाफिज-ए- बुखारी बचपन से तेजस्वी थे।
तीन वर्ष में आपने कुरान को तीन वर्ष में जबानी कंठस्थ कर लिया। इसके बाद से उनके पीछे चहेतों का हुजूम उमड़ पड़ा। सभी उन्हें अल्लाह का फरिश्ता मानने लगे। उन्होंने सऊदी अरब से लेकर अन्य मुल्कों में अपनी काबलियत साबित की।
सन 1876 में हाफिज ए बुखारी सैय्यद अब्दुस्सद समद चिश्ती ने फफूंद में अपना मुस्तकिल ठिकाना बना लिया। यहां भी धीरे-धीरे लोग उनके मुरीद होते चले गए। 19 अगस्त 1905 को फफूंद स्थित आलिया स्थल पर उनका देहांत हो गया। वह आलिया में ही सुपुर्द ए खाक कर दिए गए।