1978 में पहली हत्या करने के बाद अतीक ने जिले की आपराधिक दुनिया में वह मुकाम हासिल कर लिया था, जो उससे पहले किसी को नसीब नहीं हुआ था। जरायम की दुनिया में उस वक्त चांद बाबा छाया हुआ था।
प्रयागराज पुलिस की कस्टडी में माफिया अतीक अहमद और उसके भाई अशरफ की तीन हमलावरों ने गोली मारकर हत्या कर दी। दोनों भाइयों को स्वास्थ्य जांच के लिए शनिवार देर रात कॉल्विन अस्पताल ले जाते समय मेडिकल कॉलेज के पास मीडिया कर्मी बनकर आए तीन बाइक सवार बदमाशों ने वारदात को अंजाम दिया।
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घटना की सूचना पर पुलिस के साथ-साथ प्रशासनिक अमले में हड़कंप मच गया। मौके पर भारी फोर्स के साथ-साथ कई वरिष्ठ अफसर पहुंचे। गोलीबारी में एक सिपाही भी घायल हो गया। एक पत्रकार के भी घायल होने की खबर है। पूरे प्रदेश में अलर्ट जारी कर दिया गया है।
अतीक ने 1978 में की पहली हत्या
1978 में पहली हत्या करने के बाद अतीक ने जिले की आपराधिक दुनिया में वह मुकाम हासिल कर लिया था, जो उससे पहले किसी को नसीब नहीं हुआ था। जरायम की दुनिया में उस वक्त चांद बाबा छाया हुआ था। अतीक भी कुछ समय चांद बाबा की छत्रछाया में रहा लेकिन धीरे धीरे उसने अपना गैंग खड़ा कर लिया। इसी कारण चांद बाबा अतीक का विरोधी हो गया। शहर की आपराधिक दुनिया दो भागों में बंट गई।
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नए लड़के अतीक के साथ हो गए। पुराने चांद बाबा के साथ में थे। बात बढ़ी और अतीक व चांद बाबा एक दूसरे के जानी दुश्मन हो गए। जब अतीक ने चांद बाबा को कोतवाली क्षेत्र में मरवाया तो जुर्म की दुनिया में उसका सिक्का चलने लगा। इसके बाद तकरीबन 15 वर्षों तक किसी ने उसे चुनौती नहीं दी। 2005 में जब राजू पाल की हत्या हुई तो अतीक के दुर्दिनों की शुरुआत हो गई।
शहर पश्चिम से अतीक कई बार विधायक रहा
प्रयागराज जिले की जरायम की दुनिया में अतीक ऐसा नाम था जो वक्त के साथ सफेदपोश हो रहा था। 1989 में विधायक बनने के बाद ही अतीक सूबे के बड़े नेताओं के संपर्क में आ गया था। शहर पश्चिम सीट से उसे चुनौती देने वाला कोई नहीं था। भले ही वह निर्दलीय लड़े, सपा से लड़े या फिर अपना दल से।
गुर्गों से बड़ी से बड़ी वारदात को अंजाम दिला देता था अतीक
पार्टियों का सिर्फ नाम होता था। सिक्का चलता था अतीक अहमद का। शहर पश्चिम से वह कई बार विधायक रहा था। इस बीच उसने अपराध का तरीका बिल्कुल बदल दिया था। अब वह किसी भी मामले में सीधे शामिल नहीं होता था। अपने गुर्गों से वह बड़ी से बड़ी वारदात को अंजाम दिला देता था।
उसके खिलाफ बोलने वाला कोई नहीं था। यहां तक कि एफआईआर में उसका नाम लिखाने में लोगों की हालत खराब हो जाती थी। इस दौरान भी उसने बड़ी बड़ी घटनाओं को अंजाम दिया लेकिन हर बार बच निकला।
विधायक राजू पाल को उतारा गया था मौत के घाट
2005 में जब बसपा विधायक राजू पाल हत्याकांड को अंजाम दिया गया तो अतीक और उसके भाई अशरफ को नामजद किया गया। इसके साथ ही अतीक के जितने शूटर और करीबी थे, सभी के खिलाफ रिपोर्ट लिखाई गई। जो लोग सामने नहीं आए थे, उन्हेंं चार्जशीट में नामजद कर दिया गया था। एक तरह से देखा जाय तो अतीक के अंत की शुरूआत 25 जनवरी 2005 को राजू पाल की हत्या के दिन हो गई थी। इसी मामले में गवाह उमेश पाल का 2006 में अपहरण कर लिया गया था।
उमेश पाल की 24 फरवरी को की गई थी हत्या
उमेश पाल अपहरणकांड में ही अतीक, उसके वकील शौलत हनीफ खान और दिनेश पासी को उम्र कैद की सजा सुनाई गई थी। 24 फरवरी को उमेश पाल की हत्या कर दी गई थी। इसी मामले में अतीक और अशरफ को पुलिस कस्टडी रिमांड पर लिया गया था। बृहस्पतिवार को तीन हमलावरों ने अतीक और अशरफ की गोली मारकर हत्या कर दी। इसके साथ ही 40 साल के आतंक का खात्मा हो गया गया।
44 साल में 101 केसों के बाद पहली बार साबित हुआ था दोषी
अतीक अहमद को इसी साल 29 मार्च को (18 दिन पहले) उमेश पाल अपहरण कांड में उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। अतीक के साथ दोषी करार दिए गए दिनेश पासी और सौलत हनीफ को भी उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। हालांकि, अतीक के भाई अशरफ समेत सात जीवित आरोपी मंगलवार को दोष मुक्त करार दिए गए थे।
44 साल पहले पहला मुकदमा दर्ज
माफिया अतीक को सजा सुनाए जाने से पहले उस पर 44 साल पहले पहला मुकदमा दर्ज हुआ था। तब से अब तक उसके ऊपर 100 से अधिक मामले दर्ज हुए थे, लेकिन पहली बार किसी मुकदमे में उसे दोषी ठहराया गया था। उस पर पहला मुकदमा 1979 में दर्ज हुआ था।
इसके बाद जुर्म की दुनिया में अतीक ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। हत्या, लूट, रंगदारी अपहरण के न जाने कितने मुकदमे उसके खिलाफ दर्ज होते रहे। मुकदमों के साथ ही उसका राजनीतिक रुतबा भी बढ़ता गया। अतीक के खिलाफ कुल 101 मुकदमे दर्ज हुए। वर्तमान में अदालत में 50 मामले चल रहे थे।