पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के निधन की सूचना मिलते ही सदर तहसील से 10 किमी दूर स्थित पड़हरा खखरा खुर्द निवासी 92 वर्षीय संत प्रसाद त्रिपाठी की आंखों से आंसू बहने लगे। पूर्व पीएम के साथ गुजारे गए वक्त को याद कर उन्होंने कहा कि आज भारतीय राजनीति को ऐसी क्षति हुई है, जिसकी भरपाई नहीं हो सकती। उन्होंने कहा कि अटल जी सहजता और सादगी की मूर्ति थे।
संत प्रसाद त्रिपाठी ने बताया कि अटल जी ने 1952 में लखनऊ और 1957 में बलरामपुर से चुनाव लड़ा था। तब उन्हें उनके साथ काम करने का मौका मिला था। उन्होंने बताया कि युवा अवस्था में उन्होंने लखनऊ पार्टी कार्यालय में भी अटल जी के साथ काम किया था। त्रिपाठी ने बताया कि 1952 के लोकसभा चुनाव अटल जी के लिए प्रचार करने का मौका गिने चुने लोगों को मिला था। उनमें वे भी शामिल थे। उन्होंने कहा कि बिरहा, भोजपुरी व अन्य विधाओं में गीत प्रस्तुत कर भीड़ जुटाई जाती थी।
इसके बाद अटल जी भाषण देने पहुंचते थे। लखनऊ से अटल जी को हार का सामना करना पड़ा था। इसके बाद बलरामपुर संसदीय क्षेत्र से 1957 में चुनाव लड़े और पहली जीत दर्ज की। त्रिपाठी ने बताया कि चुनाव के साथ संगठनात्मक कार्यों के दौरान अटल जी उन लोगों के साथ ही भेली-भूजा खाने बैठ जाते थे। सहजता व सादगी की चर्चा करते हुए कहा कि देहात क्षेत्र में कीचड़ में वाहन फंसने पर अटल जी स्वयं धक्का देने में संकोच नहीं करते थे। कहा कि अटल जी के निधन से उन्हें गहरा धक्का लगा है।