नौ साल एक महीना नौ दिन लंबी कानूनी जंग जीतने के बाद अंजुम खुश है। पर उसकी आंखें अब भी नम हैं। 29/30 जून 2004 की उस स्याह रात का जिक्र चलते ही वो फफक पड़ती है।
उस रात पिता और भाई बहनों के साथ घर के आंगन में सोई अंजुम की नींद एक चीख से टूटी थी। फिर उसकी आंखों ने जो खौफनाक मंजर देखा उसने इस बच्ची को फौलाद बना दिया। पांच लोग उसके पिता अब्दुल सत्तार पर हमलावर थे, जिनमें से एक ने गंड़ासे से सत्तार की गर्दन काट डाली।
वारदात को बताते हुए अंजुम सिहर उठती है। उसकी आवाज भारी हो जाती है। वो बताती है कि उस रात मां हाशमी घर में नहीं थी। जब पिता की चीख सुनकर वो जागी तो पिता की हालत देख बिलख उठी। लेकिन कातिलों ने रोने नहीं दिया।
उन्होंने कहा, शोर मचाया तो जान से मार देंगे। इसके बाद अंजुम घर के एक कोने में खड़ी अपने पिता को कत्ल होता देखती रही। उसके छोटे भाई बहन भी उससे लिपटकर यह खौफनाक मंजर देख सिसक रहे थे।
अंजुम के छोटे भाई बहनों की उम्र तक दो से आठ साल के बीच थी। कातिलों के जाने के बाद जब अंजुम की चीख निकली तो गांव वाले मौके पर पहुंचे। अंजुम बताती है कि भाई की हत्या पहले ही हो गई थी, पिता के कत्ल के बाद मां का दिमागी संतुलन मानो बिगड़ गया।
अब अंजुम ही घर में सबसे बड़ी थी। बस तभी उसने डर को उतार फेंका और घर के मुखिया के किरदार में आ गई। उसने गांव के ही शमीम अहमद उर्फ बिल्ली, कासिम, नाजिम, मोहम्मद अय्यूब और आबिद के खिलाफ खुद एफआईआर लिखाई।
कक्षा पांच की इस छात्रा ने खुद पढ़ाई भी छोड़ दी और केस की पैरवी में लग गई। अंजुम बताती है कि उसे इस जंग में दर्जनों बार धमकियां दी गईं, हमले हुए लेकिन उसने पिता के कातिलों को सजा दिलाने की ठान ली थी।
निकाह इसलिए नहीं किया क्योंकि ससुराल वाले शायद दहेज में एक मुकदमे को न लाने देते। आठ अगस्त को जब अदालत ने सभी अभियुक्तों को उम्रकैद की सजा सुनाई तो वहीं कोर्ट रूम में अंजुम बिलख पड़ी। बोली, मुझे अदालत और कानून पर शुरू से भरोसा था।