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अलार्म बजने पर बंकर में छिप जाते थे हम

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We used to hide in the bunker when the alarm sounded - फोटो : JPNAGAR
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यूक्रेन से लौटकर आए आरपीएफ दरोगा के बेटे ने वहां के हालात बयां किए तो परिजनों के आंसू छलक आए। बोला 12 दिन बंकर में कैदियों की तरह बिताए। हर समय जान खतरे में रहती थी। भोजन आदि के लिए ही बंकर से बाहर निकलते थे। हमला होने से 15 मिनट पहले अलार्म बजने पर बंकर में छिप जाते थे। मगर यूक्रेन के नागरिक बेहद अच्छे हैं। जिन्होंने खूब सपोर्ट किया।
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मूलरूप से मेरठ निवासी चंद्रशेखर आरपीएफ दरोगा हैं। गजरौला में उनकी तैनाती है। उनका 26 वर्षीय बेटा हर्ष तालियान एक वर्ष से यूक्रेन में रहकर कंप्यूटर साइंस की पढ़ाई कर रहा था। रूसी सेना के हमले के कारण बदले हालात के चलते वह यूक्रेन में ही फंस गया था। शुक्रवार की दोपहर 12 बजे वह दिल्ली पहुंचा। इसके बाद परिजन उसे लेने के लिए दिल्ली गए थे। जहां से कार द्वारा शाम को गजरौला लेकर आए। अपने पिता के पास पहुंचे हर्ष तालियान ने यूक्रेन का मंजर बयां किया। कहा कि वहां पर गोलाबारी कानों के पर्दे फाड़ रही थी। आसमान से हो रही बमबारी से कलेजा दहल जाता था। दूर तक दहशत का माहौल दिखाई देता था। बंकर से बाहर नहीं निकलने की सख्त हिदायत थी। भोजन करने के लिए ही बंकर से बाहर निकलते थे। हमला होने से 15 मिनट पहले अलार्म बज जाता था। जिसकेे तुरंत बाद बंकर में छिप जाते थे। बंकर में 12 दिन कैदियों की तरह बिताए।
आठ मार्च को बंकर से बाहर निकल वतन वापसी की तैयारी की। इसके लिए उसने बुधवार को यूक्रेन की सीमा पार की और पोलैंड में दाखिल हुआ। यहां से गुरुवार की रात्रि 12 बजे मिली फ्लाइट पकड़ी। जिससे दिल्ली पहुंचा। गजरौला आए आरपीएफ दरोगा के बेटे ने कहा कि यूक्रेन में भले ही हालात बिगड़े हैं, लेकिन वहां के लोग बेहद अच्छे हैं। जिन्होंने उस समेत सभी विदेशियों का खूब सहयोग किया। हर्ष का कहना है कि अब वहां के हालात रहने लायक नहीं रह गए हैं।
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