थोक और फुटकर सब्जी के दामों में कई गुना अंतर दिखाई दे रहा है। आढ़त से बाहर निकलते ही सब्जियों पर दो से तीन गुना महंगाई बढ़ रही हैं। बाजार में दाम सुनते ही आंखें फटी रह जाती हैं और फिर ग्राहक-विक्रेता में बहस होता है।
लोग जहां सरकार को कोसते हैं, वहीं विक्रेता मंडी से महंगे दाम पर खरीदकर लाने की बात कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं। फिलहाल पेट भरना है, तो सब्जी खरीदनी तो पड़ेगी ही, फुटकर विक्रेता इसका फायदा उठाकर महंगाई बढ़ा रहे हैं।
सब्जियों के दाम बढ़ रहे हैं। इससे रसोई का जायका बिगड़ रहा है। गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों की थाली से अधिकांश सब्जियां गायब ही हो गई हैं। इसकी प्रमुख वजह फुटकर विक्रेता हैं, क्याेंकि मंडी अपेक्षाकृत सब्जियां सस्ती हैं। इस कृत्रिम महंगाई से निपटने को प्रशासन कोई सख्ती नहीं बरत रहा है।
अगर सब्जियों के थोक और फुटकर दामों पर नजर दौड़ाई जाए, तो इसका सीधा संबंध विक्रेताओं से है, जो अपनी मनमर्जी से दामों में बढ़ोतरी किए हैं। आलू के दाम में डेढ़ गुने का अंतर है, तो करैला में तीन गुना। मौसमी सब्जी लौकी, तुरई, टमाटर, बैगन के दाम थोक कु मुकाबले दो से तीन गुना महंगे हैं।
सब्जियों के थोक व फुटकर दामों पर नजर
सब्जी थोक रेट फुटकर रेट
आलू 12 20
लौकी 10 25
तुरई 15 40
बैगन 08 20
टमाटर 12 20
फूल गोभी 35 60
पालक 08 30
(सभी दाम रुपये किग्रा. में हैं)
सब्जियों के थोक व फुटकर दामों में अंतर का कोई मानक नहीं है। इनके भाव बाजार के हाल पर निर्भर करते हैं। निरंकार सिंह, मंडी सचिव