कस्बे में पांच मोहर्रम को दो मातमी जुलूस बरामद हुए। पहला अंजुमन-ए-आबिदिया तो दूसरा अंजुमन सौगवारान-ए-हुसैनी के तत्वावधान में बरामद हुआ। इमाम हुसैन की शहादत याद करते हुए अजादरों ने जंजीर का मातम कर खुद को लहूलुहान कर लिया। फिजा में हर तरफ से या हुसैन-या हुसैन की गूंज सुनाईं दीं।
मंगलवार दोपहर में जुलूस की शुरुआत इमामबाड़ा दौलत शहीद से की गई। मोहर्रम अली व हमनवां ने मर्सिया पढ़ा। मौलाना रजा अब्बास ने इमाम हुसैन की सीरत के मुताबिक जिंदगी गुजारने की ताकीद की। जुल्म के खिलाफ आवाज उठाने व मजलूम का साथ हर हाल में देने पर जोर दिया। जुलूस में अलम मुबारक, जुलजनाह व इमाम हुसैन की जरी मुबारक थी। अली अब्बास ने रूबाई पढ़ी। मातमी धुन के बीच आगे बढ़ा जुलूस जब मजहर-ए-कर्बला पहुंचा तो मौलाना रजा अब्बास की जुबानी रुखसती सुनकर अजादार गमगीन हो गए।
अली अब्बास, सैय्यद मंजर अब्बास, शबाब हैदर, मेजर मेहर अब्बास, आशु अली आबिद, जहीर अब्बास, नवाज मुबारक जुलूस में नौहाख्वानी करते हुए चल रहे थे। जुलूस में हजरत अब्बास के भाईयों की जंग लड़ने की मंजरकशी भी पेश की गई। अजादारों ने जंजीर से मातम बरपा कर बीबी फात्मा को लख्ते जिगर की शहादत का पुरसा दिया। इस दौरान फिजा में लब्बैक या हुसैन-लब्बैक या हुसैन की सदाएं गूंजती रहीं। देर शाम जुलूस इमामबाड़ा दौलत शहीद पहुंचकर संपन्न हुआ। इस दौरान मोहम्मद रजा, इकराम हैदर, नूर अब्बास राना, हुसैन अब्बास, मास्टर अली हैदर आदि मौजूद रहे। वहीं, अंजुमन सोगवारे हुसैनी के तत्वावधान में भी बस्ती में जुलूस निकाला गया। जिसका संचालन अध्यक्ष करीम हैदर व सचिव हैदर मेहंदी ने किया।