निजी स्कूल संचालकों ने छात्रों की संख्या बढ़ाने के लिए ट्रांसपोर्ट की व्यवस्था तो कर ली गई है। लेकिन, बच्चों की सुरक्षा भगवान भरोसे ही रहती है। जिले के कुछ स्कूलों को छोड़कर अन्य स्कूलों के वाहनों की गुणवत्ता पर कोई ध्यान नहीं दे रहे हैं। परिवहन विभाग के रिकॉर्ड में करीब 610 स्कूल वाहन पंजीकृत हैं। इनमें बस, वैन और अन्य वाहन शामिल हैं। हैरत की बात यह है कि करीब 98 स्कूली वाहन ऐसे हैं, जिनकी फिटनेस नहीं हो सकी है। जबकि, वह सड़कों पर फर्राटा भर रहे हैं।
इन वाहनों में कैमरे नहीं लगे हैं, जबकि फर्स्ट एड बॉक्स भी नहीं है। स्कूलों की बदइंतजामी और परिवहन विभाग की लापरवाही बच्चों के लिए खतरा बनी हुई है। इतना ही नहीं शहर से लेकर ग्रामीण इलाकों में सैकड़ों वाहन ऐसे हैं, जो रजिस्टर्ड भी नहीं हैं और वह बिना पंजीकरण के ही सड़क पर चल रहे हैं।
यह हैं स्कूल वाहन के मानक
- स्कूल वाहन का रंग सुनहरा पीला हो। उस पर दोनों ओर बीच में चार इंच मोटी नीले रंग की पट्टी हो।
- स्कूल बस में आगे-पीछे दरवाजों के अतिरिक्त दो इमरजेंसी गेट हों।
- सीटों के नीचे बैग रखने की व्यवस्था हो।
- बसों व वाहनों में स्पीड अलार्म लगा हो, जिससे स्कूल संचालक को वाहन की गति का पता चल सके।
- एलपीजी वाहन में अग्निशमन यंत्र की व्यवस्था हो।
- पांच साल के अनुभव वाले चालकों से ही स्कूल वाहन परिचालन की अनिवार्यता।
- स्कूल वाहन में फर्स्ट-एड बाक्स की व्यवस्था हो।
- समय-समय पर अभियान चलाकर ऐसे वाहन मालिकों और चालकों के प्रति कार्रवाई भी की जाती है। स्कूली वाहनों की निगरानी के लिए दिशा निर्देश दिए गए हैं। जल्द ही अभियान चलाकर कार्रवाई की जाएगी।
- महेश शर्मा, एआरटीओ