आजादी के अरसे बाद भी देश की राजभाषा हिंदी राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं पा सकी। बाजार और मोबाइल के जरिये यह धीरे-धीरे आगे बढ़ रही है, मगर अपनों की उपेक्षा इसकी गति में रोड़ा बनी हुई है। इससे विद्वान भी आहत हैं। हिंदी दिवस पर कुरेदे जाने पर उनका दर्द छलक आया।
उन्होंने इसकी उपेक्षा के लिए राजनीति और जिम्मदार लोगों की उपेक्षा को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया। विशेषज्ञों ने कहा कि, वैज्ञानिकता की वजह से विदेशी भी हिंदी के दीवाने हैं, मगर राजनीति और यहां के लोग इसके प्रचार-प्रसार में अपेक्षित योगदान नहीं दे रहे हैं। नतीजतन आज भी सबसे ज्यादा लोगों की भाषा अदालतों की भाषा नहीं बन सकी है।
जेएस हिंदू पीजी कालेज की प्राचार्या और हिंदी विभाग की अध्यक्ष डा. वंदना रानी गुप्ता ने कहा कि, धीरे-धीरे हिंदी अंतरराष्ट्रीय फलक पर अपनी पहचान बना रही है। दूसरे देशों के लोग हिंदी सीख रहे हैं। वहीं, हिंदी विभाग की प्रोफेसर डा. बीना रुस्तगी का कहना है कि हिंदी को राष्ट्रीय स्वाभिमान से जोड़ा जाना चाहिए। अंग्रेजी की वकालत के बजाय इसके प्रसार के लिए हमें हिंदी को तवज्जो देनी चाहिए। हर देश की अपनी राष्ट्रभाषा होती है। इसी लिए देश में सबसे ज्यादा लोगों की भाषा को राष्ट्रभाषा का दर्जा मिलना ही चाहिए।
कहा कि, हिंदी का विकास हो रहा है। आज बैंकों के काम काज के अलावा एटीएम में हिंदी में लेन-देन में इसका इस्तेमाल हो रहा है। इंटरनेट से भी इसका प्रसार हो रहा है, मगर अपने यहां मिशन मोड में इसके प्रचार-प्रसार के लिए प्रयास करना चाहिए। वहीं, हिंदी विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर डा. संयुक्ता चौहान का कहना है कि आध्यात्म और योग के जरिए तेजी से देश ही नहीं विदेशों में भी हिंदी का विकास हो रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हिंदी से भावनात्मक लगाव भी हिंदी को शिखर पर पहुंचा रहा है।
कहा कि अमेरिका, इंग्लैंड आदि देशों में लोग तेजी से हिंदी सीख रखे हैं। एक दूसरे से हिंदी में संवाद भी करते हैं। अब एयरपोर्ट पर लोग हिंदी में संवाद करते हैं। कहा कि, लेकिन इसके विकास के लिए हमें अपनी मानसिकता बदलनी होगी। हिंदी में संवाद करने को वालों का सम्मान किया जाना चाहिए।