हर मौत का कारण बताने की कीमत सिर्फ 100 रुपये है। समय बदल चुका है, जमाना भी, लेकिन पोस्टमार्टम करने वाले का मेहनताना नहीं बढ़ा है। प्रत्येक पीएम का आज भी रेट फिक्स है। हैरानी की बात ये है कि किसी भी चिकित्सक ने इस राशि को पाने के लिए पुलिस विभाग में अभी तक आवेदन नहीं किया है।
न ही अफसरों ने भुगतान के लिए कोई कदम उठाया है।
दुनिया में कामकाज करने का तरीका बदल गया है। कंप्यूटर का युग चल रहा है। हर चीज पर महंगाई छाई है लेकिन शवों का पोस्टमार्टम कर मौत की गुत्थी सुलझाने वाले चिकित्सकों का पारिश्रमिक नहीं बढ़ा है। यहां बता दें कि सूबे में सपा की सरकार बनते ही मोर्चरी घर की दशा सुधारने का फरमान जारी हुआ था। कहा गया था कि पोस्टमार्टम हाउस का आधुनिकीकरण किया जाए। शव के पोस्टमार्टम की वीडियोग्राफी कराई जाए।
एक्सरे कराया जाए ताकि कोई भी गड़बड़ी न हो पाए। धीरे-धीरे बहुत कुछ बदला भी लेकिन शव के पीएम का पारिश्रमिक तीन साल बाद भी वही है। खास बात यह है कि किसी भी डाक्टर ने उसको हासिल करने का प्रयास भी नहीं किया। न ही पीएम के समय साथ रहने वाले फार्मासिस्ट और कर्मचारी उसको लेने आगे आए आए।
जनपद के पोस्टमार्टम हाउस पर महीने में 15 डाक्टरों की ड्यूूटी लगाई जाती है। रोज औसतन दो लोगों के पोस्टमार्टम का आंकड़ा बना रहता है। पीएम हाउस पर अक्सर लोगों की भीड़ रोजाना जमा ही रहती है। जिले में कहीं न कहीं कोई घटना हो जाती है। इमरजेंसी होने पर डाक्टरों को कॉल कर भी बगैर ड्यूटी बुला लिया जाता है लेकिन उनके मेहनताने को बढ़ाने के लिए कोई कार्रवाई नहीं करता है।
कोई माने या न माने, लेकिन पीएम करने वाले डाक्टरों का मेहनताना बाकायदा सरकार की ओर से मिलता है, लेकिन जब डाक्टर और कर्मचारी नहीं ले रहे तो यह धनराशि कहां व्यय हो रही है। स्वास्थ्य महकमा भुगतान पुलिस विभाग की ओर से करने की बात कह रहा है। वहीं पुलिस विभाग का कहना है कि पीएम करना स्वास्थ्य विभाग का कार्य है।