अमरोहा। शहर का पुराना मोहल्ला लकड़ा, जहां कभी शायरी की महफिलें सजती थीं, आज गुमनाम सा है। बाजार में रौनक है लेकिन शायरी की वह गूंज अब सुनाई नहीं देती। यहां के साहित्यिक घराने ने उर्दू शायरी के साथ-साथ बाॅलीवुड में भी अमरोहा को पहचान दिलाई लेकिन एक नाम ऐसा भी है जिसे आज का युवा शायद ही जानता हो। सैयद मोहम्मद मेहदी यानी रईस अमरोहवी, यह वो नाम है जिसने एक समय में अपनी उर्दू शायरी से विदेश में भी अमरोहा का नाम रोशन किया।
तंग गलियों के बीच बसे मोहल्ला लकड़ा में अल्लामा सैयद शफीक हसन एलिया के यहां जन्मे रईस अमरोहवी ने अमरोहा से निकलकर पाकिस्तान में अपनी शायरी से अलग छाप छोड़ी। जहां उनका मकान था, वह जगह आज गुमनाम है। आसपास चहल-पहल ताे खूब बढ़ गई हलेकिन वहां अब शायरों की महफिल नहीं जमती। देश के बंटवारे के वक्त उनका परिवार पाकिस्तान जाकर बस गया। हालांकि, वहां जाने के बाद भी उनका यहां से लगाव कम नहीं हुआ था। समय-समय पर वह अपने शहर के पुराने लोगाें के बीच वक्त गुजारने के लिए आया करते थे। अदबी घराने में पैदा होने के कारण बचपन से ही उनका लगाव शायरी की ओर हो गया था।
पाकिस्तान में रहकर भी था अमरोहवी होने का अहसास
रईस अमरोहवी का परिवार आजादी के समय हुए बंटवारे में पाकिस्तान के कराची में जाकर बस गया। रिटायर्ड प्रोफेसर नाशिर नकवी बताते हैं कि वहां बसने के बाद भी देश व अमरोहा की धरती से उनका लगाव कम नहीं था। यही वजह है कि पाकिस्तान में रहने के बाद भी उन्होंने रईस अमरोहवी के नाम से ही पहचान बनाई। गैर मुल्क में भी अपनी शायरी व गजलों में भी उन्होंने अमरोहा व अपने वतन को याद किया। कराची में उन्होंने अमरोहा मरकज के नाम एक बिल्डिंग भी बनवाई, जिसमें अमरोहा व भारत से जुड़े लोग इकट्ठा होते हैं। साथ ही वहां शाह विलायत स्कूल के फाउंडर सदस्य भी रहे। लेखक भुवन शर्मा बताते हैं कि पाकिस्तान में रहते हुए भी उन्होंने अमरोहा को याद कर लिखा कि ''शक्ल जाहिर कुछ भी हो जाए, वहीं रहते हैं हम, कहीं भी हों मगर अमरोहवी रहते हैं हम''।
पाकिस्तान में प्रसिद्ध थे उनके मुक्तक
प्रोफेसर नकवी बताते हैं कि पाकिस्तान के प्रसिद्ध अखबार जंग में प्रकाशित होने वाले कता (मुक्तक) उनकी पहचान बन गए थे। आखिरी समय तक उन्होंने अखबार के लिए मुक्तक लिखे। उनके मुक्तक मौजूदा हालात को बयान करने वाले होते थे। महात्मा गांधी की हत्या का समाचार मिलने पर भी उन्होंने वहां लिखा था कि जिससे उम्मीदें जीस्त थी बांधी, ले गई उसको मौत की आंधी, गालियां खा के, गोलियां खा के, चल दिए उफ महात्मा गांधी।
22 सितंबर को घर में हो गई थी हत्या
रईस अमरोहवी की भतीजी सैयदा रूखसार जहरा कमाल बताती हैं कि चाचा ने बहुत ही कम समय में पाकिस्तान में अपनी मुखर शायरी से अपनी पहचान बनाई थी। वह एमक्यूएम (मोहाजिर कौमी मूवमेंट) से भी जुड़ गए थे। जिससे कुछ स्थानीय लोग उनके विरोध में भी आ गए और 22 सितंबर 1988 को कराची के उनके घर में हत्यारों ने गोली मारकर हत्या कर दी थी। वह बताती हैं कि उस दिन वह अपने घर पर ही अपने जीवन से जुड़ा कोई लेख लिख रहे थे। इसी दौरान वहां पहुंचे एक व्यक्ति ने उनकी गोली मारकर हत्या कर दी। उनकी माैत से उर्दू साहित्य को बड़ा झटका लगा था।