लचर संगठन, धड़ों में बंटे नेता और उत्साहहीन कार्यकर्ता यूपी में भाजपा के नए प्रभारी अमित शाह की चुनौतियां हैं।
नरेंद्र मोदी के बेहद करीबी और सांगठनिक तौर पर माहिर अमित शाह ने बतौर चुनाव प्रभारी बुधवार को उत्तर प्रदेश में भाजपा की कमान संभाली तो इन चुनौतियों पर एक बार फिर चर्चा शुरु हो गई।
एक बार फिर ये सवाल उठने लगा कि क्या अमित शाह यूपी में भाजपा को इतना मजबूत कर पाएंगे कि नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने का रास्ता साफ हो सके?
नरेंद्र मोदी का यूपी से चुनाव लड़ना तय!
यूपी पहुंचते ही अमित शाह ने कहा, ‘मैं यूपी पहली बार आया हूं, लेकिन मुझे भरोसा है कि 2014 में केंद्र में भाजपा के नेतृत्व में बनने वाली सरकार की नींव यूपी में ही पड़ेगी।’
अमित शाह यूपी में दो दिन रहेंगे और इस दौरान वो पार्टी के कार्यकर्ताओं, नेताओं, पदाधिकारियों और विधायकों से मुलाकात करेंगे।
राजनीतिक जुआ है शाह की नियुक्ति
पिछले लोकसभा चुनाव में यूपी में भाजपा को महज 17.50 फीसदी वोट मिले थे, जिनके बदौलत पार्टी 10 सीटें जीतने में कामयाब रही थी।
हालांकि 90 दशक में यही पार्टी यूपी में 50 से भी अधिक सीटें जीत चुकी हैं। उस समय प्रदेश में 25 फीसदी वोटों पर भाजपा की ही कब्जेदारी रही।
लेकिन आज भाजपा यूपी में अपने सबसे बुरे दिनों में है। अमित शाह को यूपी का चुनाव प्रभारी बनाया गया तो कई राजनीतिक पंडितों को ये जुए की तरह लगा।
'कौन हैं ये अमित शाह, मैं तो नहीं जानता'
प्रदेश में भाजपा का उत्कर्ष देख चुके पुरानी पीढ़ी के कई नेता भी इस बात को मानते हैं कि शाह रातोंरात पार्टी में कोई बड़ा बदलाव नहीं ला सकते।
हालांकि वे यह भी कहते हैं कि शाह यूपी मे सपा की मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति के कारण उपजे अंसतोष को भुनाने मे कामयाब रहे तो चुनाव में पार्टी को इसका फायदा मिल सकता है।
वरिष्ठ पत्रकार रतनमणि लाल का भी मानना है कि यूपी में वर्तमान सरकार के खिलाफ असंतोष का माहौल है। सपा को पिछले विधानसभा चुनाव में पिछड़ी जाति के वोटों के अलावा अगड़ी जाति के वोट भी मिले थे। लेकिन वर्तमान सरकार के खिलाफ पैदा हुई नाराजगी के कारण इस बार ये वोट भाजपा जैसी पार्टियों के पास जा सकते हैं।
रतनमणि लाल मानते हैं कि नरेंद्र मोदी दूसरे राज्यों मे अपना जादू चलाने में कामयाब रहे तो यूपी भाजपा को इसका फायदा मिल सकता है।