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नेत्र वालों को राह दिखा रहे नेत्रहीन %चंद्रशेखर’

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सिंहपुर (अमेठी)। कुछ कर गुजरने की तमन्ना हो तो शारीरिक अक्षमता आड़े नहीं आती। यह बात जीवन पथ दिव्यांग विद्यालय फूला के व्यवस्थापक सेवानिवृत्त शिक्षक चंद्रशेखर शुक्ल पर सटीक बैठती है। वे बीते 19 वर्षों से बिना किसी सरकारी सहायता के दृष्टि बाधित दिव्यांग बच्चों का आवासीय विद्यालय चला रहे हैं। इस विद्यालय में चार प्रदेशों के 22 विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं।
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सिंहपुर विकास क्षेत्र के फूला गांव स्थित जीवन पथ दिव्यांग विद्यालय संवेदनशील लोगों के लिए अक्सर कौतूहल का विषय रहता है। लोग मानते हैं कि जिसके घर दृष्टि बाधित दिव्यांग बच्चा हो जाए, उसकी परेशानी बढ़ जाती है। चंद्रशेखर शुक्ल ने इन बच्चों को ही अपना जीवन आधार बनाया। विद्यालय के प्रबंधक चंद्रशेखर शुक्ल तिलोई स्थित सुभाष पशुपतिनाथ विद्यापीठ इंटर कालेज में जीव विज्ञान के शिक्षक रहे हैं, वर्ष 2012 में सेवानिवृत्त हुए। एक अक्तूबर 1991 को एक दुर्घटना में उनकी दोनों आंखों की रोशनी चली गई।
उन्होंने अपनी परेशानी को भूल कर दूसरे नेत्रहीनों को समाज में जीने की राह दिखाने का रास्ता चुना। 29 जुलाई 1991 को मातृ स्मृति सेवा संस्थान नामक संस्था बनाई और इसी संस्था से 26 जून 2003 को जीवन पथ दिव्यांग आवासीय विद्यालय की स्थापना की। अपनी भविष्य निधि और बीमे की रकम से भवन की व्यवस्था की। इस विद्यालय में पढ़ने वाले छात्र झारखंड, मध्य प्रदेश, बिहार व यूपी के हैं।
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स्कूल में वर्तमान में 22 छात्र शिक्षारत हैं। इस विद्यालय को शुक्ल अपनी पेंशन व क्षेत्र के कुछ समाज सेवियों की मदद से चलाते हैं। शुक्ल ने बताया कि बिस्किट व 50 किलोग्राम चावल की मदद इंडो गल्फ से, प्रदीप सिंघल से 50 किलोग्राम आटा, रीतेश अग्रवाल से 50 किलोग्राम चावल, सुनील जैन रायबरेली से दाल, तकनीकी मदद व बैट्री इनवर्टर की मदद इग्रुवा फुरसतगंज से तथा कंबल व बिस्तर की मदद बीएचईएल जगदीशपुर से मिल जाती है।
विद्यालय की छात्रा लक्ष्मी बीए में, चार छात्र कक्षा दस में तो शेष जूनियर कक्षाओं में हैं। बहुत हाथ पैर मारने के बाद विद्यालय को मान्यता नहीं मिलने के चलते एनआईओएस (राष्ट्रीय मुक्त विद्यालय) से पंजीकृत कराकर शिक्षण कार्य चल रहा है। विद्यालय में कई डीएम और एसडीएम व अन्य अफसर आ चुके हैं, परंतु अश्वासन तो मान्यता दिलाने का सभी ने दिया परन्तु मदद किसी ने नहीं की।
सामाजिक न्याय अधिकारिता मंत्रालय से मदद मिलनी थी। सहायता और सभी औपचारिकताएं पूर्ण होने के बाद वह भी नहीं मिली। चंद्रशेखर शुक्ल बताते हैं कि सांसद बनने के बाद 18 मई 2018 को राहुल गांधी विद्यालय आए थे। इतना प्रभावित हुए कि विद्यालय को गोद लेने की घोषणा कर दी। लेकिन इसके बाद कोई पूछने भी नहीं आया। उस समय के उनके प्रतिनिधि मनोज मट्टू आगंतुक पंजिका लेकर चले गए, जो वापस नहीं मिली।
विद्यालय में चार शिक्षक छात्रों को ब्रेल लिपि में शिक्षा दे रहे हैं। जिनमें बीए में शिक्षा ग्रहण कर रही लक्ष्मी भी शामिल है। शिक्षण कार्य के अलावा कंप्यूटर शिक्षा तथा संगीत की शिक्षा भी दी जा रही है। विद्यालय के प्रबंधक चंद्रशेखर शुक्ल का कहना है कि दृष्टि बाधित बच्चों की शिक्षा इन बच्चों की जीवन की राह आसान करता है।
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