अमेठी सिटी। रबी सीजन में गेहूं के साथ तिलहन, दलहन की बोआई के समय पर डीएपी की किल्लत ने किसानों के सामने मुश्किलें खड़ी कर दी हैं। ऐसे में किसान अब डीएपी का विकल्प खोज रहे हैं। जिले के इफको केंद्रों, साधन सहकारी समितियों पर दानेदार डीएपी नदारद है। ऐसे में किसान फसलों की बोआई से पिछड़ रहे हैं। विशेषज्ञ डीएपी के प्रयोग से बचने की सलाह देते हैं।
खेतों में रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग जहां मिट्टी की उर्वरा शक्ति को खत्म कर रहा है। वहीं उपज पर भी इसका प्रभाव पड़ रहा है। जबकि समुचित मात्रा में अन्य उर्वरकों का प्रयोग कर कम खर्च में अच्छी उपज व मुनाफा कमाया जा सकता है। बाजार में डीएपी के विकल्प के रूप में सिंगल सुपर फॉस्फेट (एसएसपी), ट्रिपल सुपर फॉस्फेट (टीएसपी), एनपीकेएस मिक्स खाद 20:20:0:13 बाजार में उपलब्ध है।
जिला कृषि अधिकारी डॉ. राजेश कुमार बताते हैं कि खेतों में कैल्शियम व सल्फर नहीं डालने से मिट्टी की सेहत खराब हो रही है। डीएपी में 18 प्रतिशत नाइट्रोजन और 46 प्रतिशत फॉस्फोरस पाया जाता है। उन्होंने बताया कि इस समय नैनो डीएपी भी बेहतर विकल्प है। पांच एमएल प्रति किग्रा. की दर से बीज शोधन कर 20 दिन बाद शेष बची नैनौ डीएपी का छिड़काव करने से जहां फसल अच्छी होगी वहीं, दानेदार डीएपी की आवश्यकता नहीं होगी। कहा कि इसके अलावा (पीएसबी कल्चर) फॉस्फोरस साल्बुलाइजिंग बैक्टि्या कल्चर व गुड़ मिलाकर बीज शोधन कर बोआई करें, यह मिट्टी की उर्वरा शक्ति बढ़ाने के साथ फसल को बेहतर बनाता है।
बताया कि एनपीकेएस मिक्स खाद 20:20:0:13 में नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, सल्फर पाया जाता है, जो तिलहनी, दलहनी के साथ गेहूं के लिए फायदे मंद है। सिंगल सुपर फॉस्फेट (एसएसपी) प्रति एकड़ के हिसाब से दो बोरी व यूरिया डालकर बोआई की जाए तो कम खर्च में फसल को सभी खुराक मिल जाएगी। बताया कि इस समय डीएपी से बेहतर विकल्प के रूप में ट्रिपल सुपर फॉस्फेट (टीएसपी) है। जिसमें 46 प्रतिशत फॉस्फोरस, 13 प्रतिशत सल्फर है। इसमें जल में घुलनशील फाॅस्फोरस 42 प्रतिशत होता है जबकि डीएपी में जल में घुलनशील फाॅस्फोरस 39 प्रतिशत ही है। इन उर्वरकों का प्रयोग कर किसान अच्छी उपज और मृदा शक्ति को मजबूत करने के साथ अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं।
जागरुकता के अभाव में आती है परेशानी
किसान रंजन तिवारी ने बताया कि डीएपी नहीं मिल रही है। किसानों को रासायनिक उर्वरकों के फायदे व नुकसान की सही जानकारी नहीं होने से वह खेतों में उर्वरकों का प्रयोग करते हैं। ऐसे में गांव में गोष्ठी का आयोजन कर किसानों को फसलों के अनुसार उर्वरकों के प्रयोग की जानकारी दी जानी चाहिए। किसान रवि शुक्ल ने बताया कि नैनो डीएपी के प्रयोग को लेकर किसान असमंजस की स्थिति में हैं। कितनी कारगर होगी या नहीं। दूसरी ओर एक बार बीज शोधन करें फिर उसके बाद फसल पर छिड़काव करने का अलग खर्च। इसलिए नैनो डीएपी की खरीद से बच रहे हैं। किसान दिनेश तिवारी ने कहा कि डीएपी व एनपीकेएस तो इफको व साधन सहकारी समितियों पर मिल जाती है। लेकिन एसएसपी, टीएसपी बाहर बाजारों में मिलती है। मनमाना दुकानदार रेट लेते हैं और शुद्धता की कोई गारंटी नहीं। जिसके कारण किसान इन उर्वरकों के प्रयोग से दूरी बनाते हैं।
डीएपी में नाइट्रोजन की मात्रा कम
कृषि वैज्ञानिक डॉ. शशांक शेखर सिंह ने बताया कि वर्तमान में डीएपी की समस्या चल रही है, वास्तविकता यह है कि डीएपी इंबैलेंस खाद है। डीएपी में नाइट्रोजन की मात्रा कम है, वहीं फाॅस्फोरस की मात्रा आवश्यकता से ज्यादा है। फाॅस्फोरस ज्यादा होने पर वह जिंक का अवशोषण रोक देती है, जिससे पत्तियां पीली होने लगती हैं। जबकि गेहूं बोआई में प्रति हेक्टेयर 120 किग्रा. नाइट्रोजन, 60 किग्रा. फॉस्फोरस व 40 किग्रा. सल्फर खेत में डालना चाहिए। जिससे फसल को संपूर्ण खुराक मिलती है। एक बोरी डीएपी की जगह दो बोरी सुपर फास्फेट का विकल्प सस्ता व खेती के लिए बेहतर है। इसमें कैल्शियम व सल्फर का अतिरिक्त फायदा मिलता है। 20:20:0:13 खाद के साथ एनओपी का प्रयोग कर सर्वोत्तम खाद होगी।
आज आ जाएगी डीएपी की रैक
जिला कृषि अधिकारी ने बताया कि इस समय जिले में 2200 एमटी एसएसपी, 1309 एमटी एनपीकेएस उपलब्ध है। 380 एमटी टीएसपी अयोध्या से मिली है। वहीं, रायबरेली से 500 एमटी एनपीकेएस जल्द मिल जाएगा। 11 व 12 नवंबर में डीएपी की रैक आ जाएगी।
जैविक खेती कर प्रगतिशील किसान बने हारित सिंह
अमेठी। जिले के गौतमपुर मुसाफिरखाना निवासी हारित सिंह की जिंदगी एक फिल्म डॉक्यूमेंट्री ने बदल दी। बताते हैं कि वह टीवी पर केरल में होने वाली काजू की खेती पर डाॅक्यूमेंट्री फिल्म देख रहे थे। उस समय उस फार्म पर इंडोसल्फान नामक दवा वा छिड़काव हवाई विधि से किया जा रहा था। हालांकि कि इस दवा को बैन कर दिया गया है। लेकिन यह बहुत हानिकारक है। बताया कि तभी से जैविक खेती करने की ठानी। वर्ष 2017 में डॉ. आंबेडकर विवि. में डॉ. पालेकर के संरक्षण में जैविक खेती पर सात दिनों की ट्रेनिंग ली। उसके बाद से जैविक खेती की शुरुआत की। बताया कि जैविक खेती में सबसे जरूरी गाय के गोबर, मूत्र, जीवित मिट्टी का प्रयोग होता है। बताया कि इसमें बीजामृत, धनजीवामृत, जीवामृत, गुड़, दो दालों का बेसन आदि का प्रयोग होता है। कहा कि आज वह तीन हेक्टेयर में जैविक खेती करते हैं। जिसमें धान, गेंहू, चना, मटर, सरसों, मसूर, उड्द, सूरजमुखी, सावां, कोदो, काकुन, कुटकी, ज्वार, बाजरा, अरहर, सब्जी में बैंगन, गोभी, पालक, सोआ, मेथी, लहसून, धनिया आदि की खेती जैविक विधि से कर रहे हैं। जिससे आमदनी भी बढ़ी है तो वह जिले के प्रगतिशील किसानों में से एक हैं।