निशक्त कोटे से सफाईकर्मियों की भर्ती के लिए जिन चार आवेदकों को सीएमओ कार्यालय ने श्रवणबाधित होने का प्रमाणपत्र जारी किया था उनमें मंडलीय बोर्ड की जांच में विकलांगता का प्रतिशत मानक से काफी कम पाया गया था। जबकि राज्य चिकित्सा परिषद ने अपनी जांच में सीएमओ कार्यालय के ही प्रमाणपत्र पर ही सहमति जताई थी।
जिलाधिकारी ने दो विरोधाभासी स्थिति पाए जाने पर अब उच्च स्तरीय मेडिकल बोर्ड से जांच के लिए प्रमुख सचिव स्वास्थ्य को पत्र लिखा है। पत्र में त्रुटिपूर्ण सत्यापन आख्या देने वाले चिकित्सकों को चिह्नित कर उन पर कार्रवाई को भी लिखा है।
गौरतलब है कि वर्ष 2012 में सफाईकर्मी के पदों पर विकलांग श्रेणी के बैकलॉग पदों पर विशेष भर्ती अभियान चलाया गया था। इसमें सीएमओ कार्यालय ने चार आवेदकों में से रजनीश वर्मा को 45, हेमंत को 80, कुलिस को 100 तथा नेहा को 90 प्रतिशत श्रवण बाधित होने का प्रमाण पत्र दिया था।
जब इनका मंडलीय मेडिकल बोर्ड से सत्यापन कराया गया, तो नेहा को 28, कुलिस को 30.75, हेमंत को 26.75 प्रतिशत श्रवणबाधित बताया गया, जबकि जिस रजनीश को सीएमओ कार्यालय ने 45 प्रतिशत श्रवण बाधित बताया था, उसे मेडिकल बोर्ड ने सामान्य श्रेणी का पाया।
रजनीश सीएमओ दफ्तर में कार्यरत चालक के पद पर कार्यरत शिवराम वर्मा का पुत्र है। दोनों जांच आख्याओं के बाद डीएम ने महानिदेशक स्वास्थ्य को प्रकरण संदर्भित किया गया।
जिलाधिकारी विवेक ने अब प्रमुख सचिव चिकित्सा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण को पत्र भेजकर चिकित्सा बोर्डों के प्रमाण पत्र में अत्यधिक अंतर को गंभीर अनियमितता का मामला बताया है। कहा कि प्रकरण नियुक्ति से जुड़ा है।
इसलिए सम्यक परीक्षण के लिए एक बार फिर उच्च स्तरीय मेडिकल बोर्ड से परीक्षण कराए जाने की जरूरत है। डीएम ने त्रुटिपूर्ण सत्यापन आख्या देने वाले दोषी चिकित्सकों को चिह्नित कर उनके खिलाफ कार्रवाई किए जाने की भी संस्तुति की है।