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Fri, 12 Jan 2018 02:41 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
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इलाहाबाद - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
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लेखन की शुरुआत किसी वाह्य प्रेरणा से नहीं हुई, एक  अन्त: प्रेरणा थी जिसने मुझे लेखन की और मोड़ा। आजादी केबाद धीरे-धीरे परिवारों का टूटना, युवा वर्ग का शहरों की और पलायन और स्त्री-पुरुष संबंधों में खटास, ये सब मेरे लेखन की प्रारंभिक चिंताएं थीं, इसे मैं उस वक्त के सामाजिक, साहित्यिक और राजनीतिक वातावरण से एक मोहभंग की भावना कहता हूं। यह एक तरह से राजनीतिक विरोध भी है, सामाजिक विसंगतियों के विरुद्ध एक प्रोस्टेट भी है।
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मैं उन दिनों इलाहाबाद में विद्यार्थी था। यहां केमाहौल में साहित्य रचा-बसा था। धर्मवीर भारती मेरे गुरु थे। इन सारी स्थितियों ने एक माहौल दिया और प्रेरणा भी। मैंने पहली कहानी चौकोर छायाचित्र लिखी 1957-58 में वह कौमुदी पत्रिका में भारती जी ने प्रकाशित की। 1959 में सपाट चहरे वाला आदमी लिखी जो लहर पत्रिका में प्रकाशित हुई। इसके बाद मेरे कथा लेखन का सिलसिला चल पड़ा। एमए करने के बाद मैं कलकत्ता चला गया। वहां मैंने कहानी लिखी बिस्तर, यह सारिका में भेज दी। उस समय उसके सम्पादक मोहन राकेश थे। सारिका में वह कहानी पुरस्कृत होकर छपी। इसकेबाद मैं वापस इलाहाबाद चला आया। बाकायदा कथा लेखन की यह मेरी शुरूआत थी।

मैंने लिखना किसी से सीखा नहीं, इसलिए हमेशा वैसा ही लिखा, जैसा लिख सकता था। मेरे ऊपर किसी लेखक या शैली का प्रभाव नहीं है, मैं उर्दू का छात्र था, लेकिन किसी कारण से मुझे एम.ए. मेें प्रवेश नहीं मिल पाया, इसलिए मैंने हिन्दी में एम.ए. किया। मुझे शुरू में हिन्दी पढ़ने में बहुत कठिनाई हुई, उस समय मैं हिन्दी कथा लेखन से बहुत परिचित नहीं था, मैंने लिखने केलिए अपनी शैली ईजाद की।
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कथा लेखन में वास्तविक जिंदगी की एक भीतरी छाया रहती है, जिसको अपनी कल्पनाओं से एक लेखन रचता हैं मैं भी रचता हूं, वास्तविक जिंदगी केपात्र कहानी में बदल जाते हैं, लेकिन एक लेखक को वास्तविक जिंदगी केचरित्रों का पीछा नहीं करना चाहिए, ऐेसे में आप अपनी कल्पना शक्ति का प्रयेाग नहीं कर पाते, रचे हुए चरित्र और जीवन की वास्तविकता में बहुत फर्क होता है, और होना भी चाहिए। इसलिए मैं जीवन केचरित्रों का कभी पीछा नहीं करता, मेेरे पात्र जीवन की प्रतिच्छाया हैं, पाठक को जो अपने बीच केलगते हैं, यही लेखक की सफलता है।

अपनी सभी कहानियों में मेरी सबसे प्रिय कहानी धर्मक्षेत्रे-कुरुक्षेत्रे है, उपन्यास में यह जगह आखिरी कलाम को दूंगा, यह उपन्यास जब आया तब इसकी 31-32 समीक्षाएं आईं, हंस ने एक साथ इसकी तीन समीक्षाएं प्रकाशित कीं। इसमें मैं उपन्यासिका निष्कासन का नाम भी शामिल करूंगा।

आखिरी कलाम की संकल्पना अयोध्या काण्ड और उसके बाद फैली सांप्रदायिकता ही रही तत्सत पांडेय का किरदार एक प्रतिरोध है। सांप्रदायिकता केखिलाफ, उसका कोई रूप नहीं हैं। हालांकि तत्सत पांडेय केकिरदार की प्रेरणा मुझे सीपीआई केवरिष्ठ नेता होमी दाजी से मिली उनके व्यक्तित्व से मैं बहुत प्रभावित था, वे इंदौर में रहते थे और मैं उनसे मिलने जाता रहता था, होमी दाजी की एक छवि रह गई थी मेरे दिमाग में , जिसे मैंने रचा, वे सीपीआई केबहुत बड़े लीडर थे, सांप्रदायिकता के हमेशा खिलाफ रहे। आखिरी कलाम के किरदार तत्सत पांडेय में उनके जीवन व्यक्तित्व और आकर्षक कद काठी की छाया है, मैंने जब लिखना शुरू किया तो मुझे लगा कि मैं होमी दाजी को एक प्रतिरोध की शक्ति केरूप में दर्ज कर रहा हूं, लेकिन वह सिर्फ एक प्रतिरोध है, सांप्रदायिकता के खिलाफ इसे लिखने से पहले मैं ऐसे ही बिना पूर्व योजना केअयोध्या चला गया था, वहां कार सेवकों केटेंट लगे हुए थे एक तरह से प्रथम दृष्टि में य मेरा देखा हुआ था सब कुछ।

मैं कविताएं अधिक पढ़ता हूं, लेकिन मेरा मन कथा लेखन में ज्यादा लगता है, यह एक विचित्र तरह का विरोधाभास है, लिखने केलिए मैं कम्प्यूटर का प्रयोग नहीं करता, हाथ से ही लिखता हूं, अभी मेरे हाथ अच्छे से साथ दे रहे हैं, मैं जब कुछ लिखता हूं तो लिखता ही जाता हूं। लेकिन जब वह चीज पूरी हो जाती है तो एक अजीब तरह का अवसाद मेरा इंतजार कर रहा होता है, आखिरी कलाम जब पूरा हुआ, तो मुझे इतने गहरे अवसाद ने घेर लिया कि मुश्किल से जिंदंगी बची, अस्पताल में भरती होना पड़ा, लेकिन लिखते हुए अगर कोई चीज बीच में रुक गई तो वह मुझसे पूरी नहीं होती। तब चीजें छूट जाती हैं. तो उन्हें पकड़ना और आगे ले जाना मेरे लिए एक मुश्किल हो जाता है। बस्तर के अबूझमाड़ इलाके में मैं बहुत जाता था। उस पर एक उपन्यास शुरू किया, लेकिन वह बीच में ही छूट गया। अब सोच रहा हूं उसे पूरा करूं पर हो नहीं पाता। तब से अब तक स्थितियां भी बहुत बदल गई हैं।

 मैं इलाहाबाद में 1965 से हूं। निरालाजी जिस घर में रहते थे वह मेरी बुआ का था। मैं अक्सर बुआ के घर जाया करता था। वहीं उनसे परिचय हुआ। वे परिवार के सदस्य की तरह थे। सुमित्रानंदन पंत ने मुझे विश्वविद्यालय में नौकरी दिलाई, जबकि मेरा उनसे कोई खास परिचय नहीं था। उन दिनों लोग भी बहुत सहृदय हुआ करते थे। महादेवी वर्मा भी इलाहाबाद में रहा करती थीं, लेकिन उनसे भी बहुत ज्यादा परिचय नहीं था। इस बीच मैं बहुत बीमार हो गया और अस्पताल में भरती होना पड़ा। मेरी पत्नी अकेली थीं, तब उन्होंने सरकार को चिट्ठी लिखकर कि एक युवा लेखक गंभीर रूप से बीमार है और उसकी मदद होनी चाहिए, मेरे लिए आर्थिक मदद मांगी। मेरा सौभाग्य है कि मैं हिंदी के इन तीन महान कवियों के संपर्क में आया। मेरी, लौट आ ओ धार, निराला आत्महंता आस्था और महादेवी किताबें इन तीनों पर केंद्रित हैं। एक तरह से इनकी कर्ज अदायगी की कोशिश है। जैसे किसी चीज का स्पर्श लोहे को सोना बना देता है वैसे ही इनके स्पर्श से मेरी लेखकीय प्रतिभा का विकास हुआ, लेकिन मैने इनका तौर तरीका नहीं अपनाया। ये तीनों कवि थे और मैने कथा लेखन से शुरुआत की। पर यह कह सकते हैं कि सुमित्रानंदन पंत, महादेवी वर्मा और निराला के साथ इलाहाबाद शहर ने मुझे लेखक बनाया।
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(साहित्य भंडार से प्रकाशित कहानी संग्रह ‘सपाट चेहरे वाला आदमी’ से साभार)
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