लिहाजा, यूपी में भी उसी समय से जरूरी कर दिया गया। उस समय प्रतिवादी शिक्षक टीईटी पास नहीं थे। लिहाजा, ये बतौर शिक्षक नहीं नियुक्त किए जा सकते थे। इनकी नियुक्ति अवैध है। इसलिए बीएसए मुरादाबाद ने इनके आवेदन के अनुमोदन को मना कर दिया। एकल पीठ ने 20 जून 2022 को अपने आदेश में इन तथ्यों को ध्यान न देते हुए एकतरफा आदेश पारित कर दिया। जवाब में प्रतिवादियों/शिक्षकों के अधिवक्ता की ओर से तर्क दिया गया कि यूपी सरकार ने प्राथमिकी विद्यालयों में शिक्षकों की नियुक्ति की अनिवार्यता के लिए आठ अप्रैल 2013 को शासनादेश जारी किया है। प्रतिवादियों की नियुक्ति उसके पहले ही हो चुकी थी।
इसके अलावा सरकार ने शिक्षकों की टीईटी पास करने के लिए बार-बार समय भी दिया। अब ये प्रतिवादी/शिक्षक टीईटी पास है। लिहाजा, इन्हें शिक्षक मानते हुए वेतन दिया जाए। सरकारी अधिवक्ता ने कहा कि यूपी सरकार ने उन शिक्षकों को टीईटी पास करने का समय दिया, जिनकी नियुक्ति एनसीटीई की जारी अधिसूचना से पहले की हुई है। एनसीटीई की अधिसूचना जारी होने केबाद नियुक्त होने वाले शिक्षकों को नहीं दी है। इस पर कोर्ट ने मामले को विचारिणीय मानते हुए यूपी सरकार से टीईटी की अनिवार्यता कब से की गई। इसकी जानकारी मुहैया कराने को कहा है।