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यूपीपीएससी : चार साल बीते, पर सीबीआई ने अब तक किसी के खिलाफ नहीं की सीधी कार्रवाई

Sun, 13 Feb 2022 05:13 AM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज

सार

भर्तियों में भ्रष्टाचार और बेरोजगारी के खिलाफ मोर्चा खोल चुके प्रतियोगी छात्र सीबीआई जांच में लेटलतीफी के लिए प्रदेश सरकार को भी जिम्मेदार ठहराते हैं। उनका आरोप है कि सरकार ने जांच में सहयोग नहीं दिया और इसी वजह से भर्तियों में धांधली के लिए दोषी लोग अब तक पकड़ से बाहर हैं। 
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UPPSC - फोटो : Social media
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विस्तार
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उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग (यूपीपीएससी) की सीबीआई जांच से भी प्रतियोगी छात्रों को हताशा ही मिली। जांच को चार साल बीत चुके हैं और अब तक किसी के खिलाफ कोई सीधी कार्रवाई नहीं हुई।

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भर्तियों में भ्रष्टाचार और बेरोजगारी के खिलाफ मोर्चा खोल चुके प्रतियोगी छात्र सीबीआई जांच में लेटलतीफी के लिए प्रदेश सरकार को भी जिम्मेदार ठहराते हैं। उनका आरोप है कि सरकार ने जांच में सहयोग नहीं दिया और इसी वजह से भर्तियों में धांधली के लिए दोषी लोग अब तक पकड़ से बाहर हैं। 



प्रतियोगी छात्र संघर्ष समिति ने सोशल मीडिया पर अपना मांगपत्र जारी किया है, जिसमें सीबीआई जांच को लेकर जांच एजेंसी सहित सरकार और यूपीपीएससी पर भी निशाना साधा गया है। चार साल पहले प्रतियोगी छात्रों की मांग पर मुख्यमंत्री ने 20 जुलाई 2017 को आयोग की परीक्षाओं की सीबीआई जांच की घोषणा की थी।

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21 नवंबर 2017 को जारी हुई थी अधिसूचना

31 जुलाई 2017 को सीबीआई जांच की सिफारिश केंद्र सरकार के पास भेजी गई और 21 नवंबर 2017 को केंद्र सरकार के कार्मिक एवं पेंशन मंत्रालय की ओर से सीबीआई जांच की अधिसूचना जारी की गई। 31 जनवरी 2017 को सीबीआई की टीम ने आयोग परिसर में प्रवेश किया और भर्तियों से जुड़े दस्तावेजों की जांच पड़ताल शुरू की। हालांकि पहले दिन सीबीआई को विरोध का सामना भी करना पड़ा।



जांच रुकवाने के लिए आयोग कोर्ट भी पहुंचा, लेकिन वहां से आयोग को राहत नहीं मिली। सीबीआई को अप्रैल-2012 से मार्च-2017 की अवधि में तकरीबन 633 भर्ती परीक्षाओं की जांच करनी थी, जिनके तहत 40 हजार से अधिक पदों पर चयन हुए थे। जांच तेजी से आगे बढ़ी और भर्तियों में भ्रष्टाचार की शिकायत दर्ज कराने बड़ी संख्या में अभ्यर्थी सीबीआई टीम के समक्ष उपस्थित हुए।

12 हजार अभ्यर्थियों के दर्ज किए जा चुके हैं बयान
अब तक तकरीबन 12 हजार अभ्यर्थियों के बयान दर्ज किए जा चुके हैं। भर्तियों में धांधली के सुबूत मिलने के बाद सीबीआई ने पीसीएस भर्ती-2015 और अपर निजी सचिव (एपीएस) भर्ती-2010 के मामले एफआईआर दर्ज कर ली। एपीएस भर्ती के मामले में पूर्व परीक्षा नियंत्रक प्रभुनाथ को नामजद किया गया, लेकिन किसी भी मामले में कोई सीधी कार्रवाई नहीं हुई।



जब सवाल उठने लगे कि भर्तियों में भ्रष्टाचार के सुबूत मिल चुके हैं तो सीबीआई कोई गिरफ्तारी क्यों नहीं रही। तब यह बात सामने आई कि लोक सेवकों के खिलाफ सीधी कार्रवाई के लिए सीबीआई को सरकार और यूपीपीएससी से अभियोजन की स्वीकृति चाहिए, जिसकी फाइल अभी तक अफसरों की टेबल धूल फांक रही है।



प्रतियोगी छात्र संघर्ष समिति के अध्यक्ष अवनीश पांडेय का कहना है कि जांच को तेजी से आगे बढ़ाने के लिए छात्रों को न्यायालय की शरण में जाना पड़ा, ताकि एसआईटी का गठन किया जा सके। सरकार जवाब दे कि ऐसी परिस्थिति क्यों उत्पन्न हुई कि सीबीआई जांच के मामले में छात्रों का सरकार से भरोसा उठ गया।
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चार वर्षों में तीन अफसरों को मिला जांच का जिम्मा
पिछले चार वर्षों में तीन अधिकारियों को आयोग की भर्ती परीक्षाओं का जांच का जिम्मा मिल चुका है। दिसंबर 2017 से नवंबर 2018 तक सिक्किम कैडर के आईपीएस अधिकारी राजीव रंजन जांच अधिकारी रहे। इसके बाद नवंबर 2018 से दिसंबर 2021 तक आईआरएस अफसर जितेंद्र कुमार को यह जिम्मेदारी मिली और जनवरी 2022 से दिल्ली कैडर के आईपीएस अधिकारी अतुल ठाकुर यह जिम्मेदारी संभाल रहे हैं।
 


बयान देने के बाद सहमे हैं अभ्यर्थी
सीबीआई में अपना बयान दर्ज कराने के बाद तमाम अभ्यर्थी सहमे हुए हैं। प्रतियोगी छात्र संघर्ष समिति के अध्यक्ष अवनीश पांडेय एवं मीडिया प्रभारी प्रशांत पांडेय का कहना है कि अभ्यर्थियों ने जिन परीक्षा माफिया के खिलाफ अपने बयान दर्ज कराए हैं, उन्हें अब माफिया से खतरा महसूस हो रहा है, क्योंकि वे खुलेआम घूम रहे हैं और उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई। अगर किसी अभ्यर्थी के साथ कोई दुर्घटना होती है तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा।
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