यूपी बोर्ड के सीबीएसई और सीआईएससीई की राह पकड़ने और स्टेप मार्किंग का आदेश दिए जाने के बाद बोर्ड की कार्य प्रणाली ही सवालों के घेरे में आ गई है। बोर्ड की ओर से सबसे पहले रिजल्ट घोषित करने की आपाधापी में मेधावी छात्रों के साथ अन्याय की बात सामने आई है। बोर्ड की ओर से इस बार 30 मार्च से 13 अप्रैल के बीच मूल्यांकन करने को लेकर प्रधानाचार्यों ने सवाल खड़ा किया है। यूपी बोर्ड ने मात्र 15 दिन में 61 लाख से अधिक कापियाें का मूल्यांकन पूरा कर दिया, यह मूल्यांकन की शुचिता पर सवालिया निशान है।
विद्याभारती से जुड़े रानी रेवती सरस्वती विद्या मंदिर के प्रधानाचार्य आत्मानंद सिंह, ज्वाला देवी सरस्वती विद्या मंदिर सिविल लाइंस के प्रधानाचार्य जुगल किशोर मिश्र, ज्वाला देवी सरस्वती विद्या मंदिर गंगापुरी के प्रधानाचार्य सुरेश सिंह एवं सरस्वती विद्या मंदिर शास्त्री नगर के प्रधानाचार्य दयाराम यादव ने पत्रकार वार्ता के दौरान संयुक्त रूप से आरोप लगाया कि यूपी बोर्ड की कार्य प्रणाली को संदेह के घेरे में है। उन्होंने कहा कि गलत तरीकेसे मूल्यांकन होने पर मेधावी छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ हो रहा है। उन्होंने कहा कि यह सवाल उठता है कि जब सीबीएसई की ओर से एक परीक्षक को मूल्यांकन के लिए एक दिन में मात्र 25 कॉपी दी जाती हैं तो यूपी बोर्ड अधिक से अधिक कॉपी जांचने का रिकार्ड बनाने को क्यों अमादा है। उन्होंने इस बात को लेकर सवाल खड़ा किया कि अचानक बोर्ड का रिजल्ट 88 फीसदी से अधिक पहुंच गया है जबकि हरियाणा बोर्ड का रिजल्ट मात्र 62 फीसदी ही है।
विद्या भारती से जुड़े प्रधानाचार्यों ने प्रदेश सरकार से छात्राओं के लिए मिली स्वकेंद्र परीक्षा व्यवस्था को खत्म कर उनके लिए एक किमी की परिधि में केंद्र बनाने की मांग की है। प्रधानाचार्यों ने कई जिलों में टॉप टेन में छात्राओं के ही छाए रहने पर सवाल खड़ा किया है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि उनकी मंशा यह नहीं है कि जो छात्राएं प्रदेश की टॉप मेरिट में आई हैं, वह मेधावी नहीं हैं। उन्होंने कहा कि प्रदेश के 74 जिले में से चार जिले ऐसे हैं जहां हाईस्कूल की टॉप टेन में एक भी छात्र नहीं है जबकि उन्नाव की इंटर की मेरिट में टॉप टेन में कोई छात्र नहीं है। प्रधानाचार्यों ने अपनी बात प्रदेश के मुख्यमंत्री और शिक्षामंत्री केसाथ अधिकारियों तक पहुंचाने की बात कही है।