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अनोखा रिकॉर्ड : एक सिपाही ने 10 सालों में की पांच हजार शवों की वीडियोग्राफी, ट्रेनिंग के बाद से यहीं हैं तैनात

Wed, 31 Jan 2024 05:14 PM IST
विनोद सिंह अमर उजला नेटवर्क, प्रयागराज

सार

रोहित कानपुर नगर के ग्वाल टोली के रहने वाले हैं। वह 2011 बैच में कांस्टेबल पद पर नियुक्त हुए थे। बांदा में ट्रेनिंग पूरी होने के बाद 2014 में पहली नियुक्ति प्रयागराज में मिली। उन्हें एक हेड कांस्टेबल के साथ पोस्टमार्टम हाउस में वीडियोग्राफी के लिए तैनात कर दिया गया।
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सिपाही रोहित कुमार कन्नौजिया। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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पुलिस के दस्तावेजों में ऐसा कोई रिकॉर्ड तो नहीं बनता, लेकिन यह है अजीबोगरीब रिकॉर्ड ही। ...पोस्टमार्टम के लिए लाए गए शवों की वीडियोग्राफी करने का रिकॉर्ड। इसे बनाया है, यहां पोस्टमार्टम हाउस में तैनात कानपुर निवासी सिपाही रोहित कुमार कनौजिया ने। वह 10 वर्षों में पांच हजार शवों की रिकॉर्डिंग कर चुके हैं। इन्हें थाने की पोस्टिंग की चाह है न ही कहीं और की। ट्रेनिंग के बाद से वह यहीं रमे हुए हैं।

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रोहित कानपुर नगर के ग्वाल टोली के रहने वाले हैं। वह 2011 बैच में कांस्टेबल पद पर नियुक्त हुए थे। बांदा में ट्रेनिंग पूरी होने के बाद 2014 में पहली नियुक्ति प्रयागराज में मिली। उन्हें एक हेड कांस्टेबल के साथ पोस्टमार्टम हाउस में वीडियोग्राफी के लिए तैनात कर दिया गया। कुछ महीने बाद हेड कांस्टेबल का तबादला हो जाने के बाद सारा जिम्मा रोहित ही निभा रहे हैं। अब तक वह पांच हजार शवों की रिकॉर्डिंग कर चुके हैं।

प्रदेश में रोहित जैसा शायद ही कोई दूसरा पुलिसकर्मी हो, जिसने पोस्टमार्टम के लिए आए इतने शवों की वीडियोग्राफी की हो। उन्हें न थाने की मलाईदार मानी जाने वाली पोस्टिंग से मतलब है, न ही किसी और जगह ड्यूटी से। यहीं काम का आनंद ले रहे हैं। तभी, फील्ड में नौकरी की शुरुआत से वह पोस्टमार्टम हाउस में ही ड्यूटी निभा रहे हैं। दूसरी जगह तैनाती की कभी इच्छा भी नहीं जताई। अब इन्हें एक सहकर्मी भी मिल गया है।

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जाना चाहते थे फॉरेंसिक विभाग में

चीर-फाड़ देखकर या बदबू से मन नहीं ऊबता? रोहित बताते हैं कि वह फॉरेंसिक विभाग में नौकरी चाहते थे। यह नहीं मिली। पर, सिविल पुलिस की इस तैनाती से सपना पूरा हो गया। अब तो अनुभव भी इतना हो गया है कि पोस्टमार्टम करने आए नए डॉक्टरों को बारीकियां बता देते हैं। 2017 में हुई डॉ. एके बंसल की हत्या, 2021 में महंत नरेंद्र गिरि की मौत अथवा 2023 में अतीक-अशरफ की हत्या...पोस्टमार्टम से पहले शवों की वीडियोग्राफी इन्होंने ही की है।


क्यों जरूरी है वीडियोग्राफी

वीडियोग्राफी हर शव की नहीं होती। इसके लिए जिलाधिकारी की अनुमति अनिवार्य है। यह वीडियोग्राफी उन्हीं मामलों में होती है, जब मौत का कारण स्पष्ट न हो या फिर चोट आदि को लेकर कोई विवाद हो अथवा कोई बड़ा घटनाक्रम हुआ हो, जिसे लेकर भविष्य में कोई सवाल खड़ा होने की आशंका दिखती हो। मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. आशु पांडेय का कहना है कि वीडियोग्राफी सुबूत के लिए होती है, ताकि कानूनी दांवपेच फंसने पर उसे प्रस्तुत किया जा सके। काम में पारदर्शिता बनी रहे।
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