उमेश को उस समय लगा था कि यह उसकी आखिरी रात है। अतीक ने उससे हलफनामा पर दस्तखत करा लिए। हलफनामा पर लिखा था कि वह घटनास्थल पर मौजूद नहीं था। न ही उसने किसी को वहां देखा था। अगले दिन यानी एक मार्च को अतीक ने अदालत में उमेश के हलफनामा को प्रस्तुत कर अदालत के सामने गवाही भी दिलवा दी थी। उस समय शासन प्रशासन में अतीक की तूती बोलती थी।
2007 में जब बसपा सरकार बनी तो स्थिति बदलने लगी। अतीक के खिलाफ कार्रवाई शुरू हो गई। पांच जुलाई 2007 को उमेश ने अतीक, अशरफ और उनके गुर्गों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करा दिया। उमेश ने लगकर अपने केस में पैरवी की। उसे मुकाम तक लगभग पहुंचा ही दिया था, लेकिन फैसला आने से तकरीबन एक महीने पहले ही उमेश की हत्या कर दी गई। 28 मार्च को उमेश अपहरण कांड में सजा का ऐलान होगा। कटघरे में उसे रात भर पीटने वाले अतीक, अशरफ समेत अन्य गुर्गे होंगे।