इंडिया गठबंधन में कांग्रेस को मिली है इलाहाबाद सीट
सपा ने गठबंधन की सहयोगी कांग्रेस के लिए इलाहाबाद सीट छोड़ी है, जबकि फूलपुर से वह खुद अपना प्रत्याशी उतारेगी। वैसे, पिछले चुनावों का हाल देखें तो सपा प्रत्याशी कांग्रेस से काफी आगे रहे हैं। 1991 से 2019 के बीच हुए आठ लोकसभा चुनावों में कांग्रेस प्रत्याशी सिर्फ एक बार अपनी जमानत जब्त होने से बचा पाए।
यह जमानत भी 1999 के चुनाव में बचाई प्रो. रीता बहुगुणा जोशी ने। फिलहाल तो वह भाजपा की इलाहाबाद सीट से ही सांसद हैं। इनके अलावा 1991 में कांग्रेस उम्मीदवार अनिल शास्त्री को 15.91 और 2014 में नंद गोपाल गुप्ता नंदी (अब भाजपा नेता) को 11.49 प्रतिशत वोट ही हासिल हो सके थे। बाकी उम्मीदवारों को सात फीसदी से भी कम वोट नसीब हुए।
वहीं, सपा ने 1998 के चुनाव में इलाहाबाद सीट पर पहली बार सीधे अपना प्रत्याशी उतारा। फिर, छह बार के आम चुनावों में दो बार रेवती रमण सिंह सांसद चुने गए। चार दफा सपा उम्मीदवार दूसरे स्थान पर रहे। अब कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में उज्ज्वल भले ही पंजे के निशान पर चुनाव लड़ें, बगैर साइकिल की सवारी के उनका कोई भला नहीं होने वाला।
विधानसभा चुनाव में दो फीसदी भी मत नहीं
2022 के विधानसभा चुनाव के नतीजे बताते हैं कि इलाहाबाद संसदीय सीट की पांचों विधानसभा सीटों में कांग्रेस का प्रदर्शन बेहद खराब रहा है। सिर्फ कोरांव में पार्टी उम्मीदवार को 10 फीसदी से अधिक वोट मिले। बाकी तीन विधानसभा सीटों में उम्मीदवारों को दो फीसदी भी मत हासिल न हो सके। मेजा में तो एक फीसदी भी मत नहीं मिले। सपा का प्रदर्शन देखें तो मेजा से संदीप पटेल ने जीत हासिल की। बाकी चार सीटों पर भी सपा प्रत्याशी मुख्य मुकाबले में रहे। कोरांव को छोड़कर बाकी विधानसभा सीटों में सपा को करीब 40 फीसदी वोट मिले।