संघ लोक सेवा आयोग की ओर से मंगलवार को घोषित सिविल सेवा के अंतिम परिणाम में संगम नगरी के दो प्रतियोगियों ने प्रथम 50 में स्थान बनाया है। नैनी के अश्वनी पांडेय ने 34वीं रैंक के साथ इस प्रतिष्ठित परीक्षा में सफलता पाई है। वहीं यहीं रहकर तैयारी करने वाले सौरभ गहरवार को 46वीं रैंक मिली है। हालांकि संख्या के लिहाज से यहां के प्रतियोगियों को निराशा हाथ लगी है। देर रात तक प्राप्त जानकारी के अनुसार सफल होने वालाें की संख्या 10 से भी कम है। जबकि, सीसैट लागू होने से पहले 50 से अधिक प्रतियोगी सफल होते रहे हैं।
प्रारंभिक परीक्षा में सीसैट को क्वालीफाइंग पेपर करने के बाद उम्मीद जगी थी कि हिन्दी पट्टी के अभ्यर्थियों के सफलता का ग्राफ फिर ऊपर जाएगा लेकिन मुख्य परीक्षा का परिणाम आने के बाद ही उम्मीदों को झटका लगा। यहां के प्रतियोगी मुख्य परीक्षा के नए प्रारूप के अनुरूप अभी खुद को नहीं ढाल पाए हैं। इसका असर अंतिम परिणाम में भी सामने है। देर रात तक मिली जानकारी के अनुसार अश्वनी और सौरभ के अलावा यहां के मनीष देव मिश्रा, प्रियंका सिंह, एसएसल के मनोज पांडेय ने सफलता हासिल की है। डॉ.डीएन देव के पुत्र मनीष देव मिश्रा ने 257वीं रैंक के साथ सफलता पाई है। इनका पूर्व में 2012 में भी चयन हो चुका है। मनीष 2003 में जीआईसी से इंटरमीडिएट किया है और पूरे प्रदेश में 17वां स्थान प्राप्त किया था। कानपुर आईआईटी से बीटेक के बाद तैयारी में जुट गए और लगातार पांच बार इंटरव्यू दिया। मोतीलाल नेहरू मेडिकल कालेज से एबीबीएस प्रियंका को 362वीं रैंक मिली है। इस समय वह दिल्ली के सफदरजंग हॉस्पिटल से एमडी कर रही हैं। उनके पति राजेश सिंह भी पीसीएस अधिकारी हैं और इस समय मेरठ में तैनात हैं।
इतने खराब परिणाम के पीछे इलाहाबाद विश्वविद्यालय में व्याप्त अराजकता को मुख्य कारण माना जा रहा है। एक समय इलाहाबाद आईएएस का गढ़ रहा। इसके पीछे विश्वविद्यालय की फैकेल्टी का परंपराओं का विशेष योगदान रहा लेकिन पिछले कुछ वर्षों से विश्वविद्यालय में पढ़ाई का स्तर काफी नीचे गए है। इसका असर परिणाम पर है। सिविल सेवा कोच रनीश जैन का कहना है कि विश्वविद्यालय में पढ़ाई शोधार्थियाें के भरोसे है। इससे पुराना माहौल गायब हो गया है। इसके अलावा प्रशिक्षण देने वाले संस्थान भी सिविल सेवा के नए प्रारूप को समझ नहीं पा रहे।
मेहनत है सफलता की कुंजी
सिविल सेवा में 34वां स्थान पाने वाले अश्वनी पांडेय पूर्व में भी दो बार इस प्रतिष्ठित परीक्षा में चयनित हो चुके हैं। उन्होंने 2011 और 2013 में सफलता पाई है और इस समय भारतीय राजस्व सेवा में कार्यरत हैं। रिटायर लेखाकार द्वारका प्रसाद और केंद्रीय विद्यालय में प्रधानाचार्य रहीं कमला पांडेय के पुत्र अश्वनी ने माता-पिता और भाई के मार्गदर्शन को सफलता का श्रेय दिया। उनके बड़े भाई अंजनी कुमार पांडेय भी आईएएस हैं। एक अन्य भाई पवन अधिवक्ता हैं। एनआईटी दुर्गापुर तथा अमेरिका ओक्ला होमा विश्वविद्यालय के मेधावी छात्र रहे अश्वनी की पत्नी शुचि भी ट्रिपलआईटी से एमटेक हैं। उनका कहना है कि सही दिशा में कठिन परिश्रम की सफलता का मूलमंत्र है।
देश सेवा के लिए बना आईएएस
सिविल सेवा में 46वीं रैंक के साथ सफल डॉ.सौरभ आईएएस बनकर देश की सेवा करना चाहते हैं। उन्होंने पहले प्रयास में यह सफलता हासिल की है। उन्होंने बताया कि 2006 में बीएचयू से एमबीबीएस करने के बाद एसपीजीआई चले गए। फिर एम्स में सीनियर रेजिडेंट बने। उनका कहना है कि वह आईएएस बनकर देश की सेवा करना चाहते हैं। इसलिए तैयारी के लिए 2014 में इलाहाबाद आ गए और कुछ महीने की तैयारी में सिविल सेवा-2015 में इतनी बड़ी उपलब्धि हासिल की। उनका कहना है कि सफलता का कोई शार्टकट नहीं होता लेकिन सही रणनीति बनाकर तैयारी से सफलता जरूर मिलती है।