राजधानी लखनऊ लंबित मुकदमों में टॉप पर है। यहां सबसे अधिक (दो लाख से अधिक) मुकदमे लंबित हैं जबकि इलाहाबाद का स्थान दूसरा है। सूबे के प्रमुख शहरों मेें लंबित मुकदमों की संख्या भी ज्यादा है। गत 25 अप्रैल को नई दिल्ली में आयोजित मुख्य न्यायाधीशों और मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन के बाद लंबित वादों में कमी लाने पर बहस तेज हो चली है। 50 लाख से अधिक लंबित मुकदमों वाले प्रदेश में मुकदमों का निस्तारण बड़ी चुनौती है।
सूबे के प्रमुख जिलों में लंबित मुकदमों के आंकड़ों पर गौर करें तो राजधानी का स्थान सबसे ऊपर है। यहां 2,19,499 केस लंबित हैं। जबकि इलाहाबाद में 1,95,335 मुकदमों का निस्तारण अटका है। इन जिलों की अदालतें कर्मचारियों और मूलभूत सुविधाओं की कमी से भी जूझ रही हैं। मंगलवार को हाईकोर्ट की सात जजों की बेंच में जिला अदालतों की सुरक्षा और मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने पर गंभीर चिंता जाहिर की गई। सूबे की अधिकांश जिला अदालतों में जजों की कमी के अलावा स्टाफ और मूलभूत सुविधाओं (बिजली, पानी, बैठने के स्थान) की जबरदस्त कमी है।
हाईकोर्ट की वृहदपीठ ने साल भर पहले सरकार को जजों की नियुक्ति सहित जिला अदालतों में सुरक्षा तथा सुविधाएं बढ़ाने का निर्देश दिया था। मुख्य सचिव आलोक रंजन ने स्वयं उपस्थित होकर अदालत को आश्वासन दिया कि सरकार जल्द ही इस दिशा में कदम उठाएगी। मुख्य अखिलेश यादव ने भी हाईकोर्ट के 150 वें स्थापना दिवस समारोह में आश्वासन दिया कि सरकार मुकदमों के निस्तारण और सुविधाएं बढ़ाने को लेकर बेहद गंभीर है, मगर कोर्ट के आदेश के साल भर बाद भी सरकार कार्यवाही के नाम सिर्फ हलफनामे ही दाखिल कर रही है।
प्रदेश के प्रमुख शहरों में लंबित मुकदमों की स्थिति
लखनऊ - 2,19,499
इलाहाबाद- 1,95,179
कानपुर नगर- 1,95,179
मेरठ - 1,45,454
गाजियाबाद- 1,44,044
गौतमबुद्ध नगर- 1,32,947
गोरखपुर - 1,25,090
वाराणसी- 1,20,496
आजमगढ़- 1,15,864
आगरा- 1,10,197