मनुष्य में ऐसी कोई ताकत नहीं कि वह परमेश्वर के जलाए दीपक को बुझा सके। हमारे मुंह से शब्द निकलें, इससे पहले ही वह उन्हें जान जाता है। परमेश्वर ही हमें अनंत जीवन देता है। यदि तुम उन्हें माफ कर दोगे, जिन्होंने तुम्हें कष्ट पहुंचाया है, तो यीशु तुम्हारे सारे पापों को भी क्षमा कर देगा। सच्चाई के रास्ते से भटके लोगों को सही राह पर लाने के लिए वह जीवित ही पृथ्वी पर दोबारा आएगा। यह बातें पुराने यमुना पुल के पश्चिमी छोर पर बने यीशु दरबार में बिशप आरबी लाल ने प्रवचन के दौरान कहीं।
दरबार में न सिर्फ इलाहाबाद के दूरदराज इलाकों बल्कि उत्तर प्रदेश के अन्य जिलों सहित छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, उत्तराखंड आदि राज्यों से बोरी-झोरी और बैग-अटैची के साथ हजारों की संख्या में आए अनुयायियों का जबर्दस्त जमावड़ा रहा। तय वक्त से कई घंटे पहले से ही लोगों के आने का सिलसिला शुरू हो गया था। मंच से पवित्र बाइबिल के अंशों का पाठ आरंभ हुआ तो सामने बैठे लोग भी अपनी बाइबिल खोलकर उन पंक्तियों का मिलान और पाठ करने लगे। इस मान्यता के साथ कि इसमें सभी दुखों, बीमारियों का निदान है। श्रद्धालुओं की मदद के लिए पंडाल में महिला-पुरुष कार्यकर्ता चहलकदमी करते रहे। पास्टर रामबहादुर ने परमेश्वर की स्तुतियां कीं, फिर बिशप आरबी लाल का प्रवचन शुरू हुआ।
प्रवचन के बाद शुरू हुआ चंगाई का सिलसिला। आदेश मिला, सभी अपनी जगह पर खड़े होकर दायां हाथ सीने और बायां हाथ ऊपर उठाकर परमेश्वर की प्रार्थना करें। मंच से बिशप आरबी लाल और डॉ.सुधा लाल ने हाथ हिलाते हुए आशीर्वाद दिया और दुखियारों के दुखों के निवारण के लिए प्रार्थना की। दावा किया कि परमेश्वर इसी क्षण रामदीन से लेकर रहमान तक सभी के दुखों का अंत कर देगा।
अभी यह सिलसिला चल ही रहा था कि पंडाल के अलग-अलग कोने से रोने, चीखने, चिल्लाने की आवाजें आने लगीं। कहीं कोई बेटी तो कहीं कोई महिला हाथ-पांव पटककर जमीन पर ही लोटने लगी, जिसे परिजनों की मदद से स्वयंसेविकाएं उसे बिशप बाबा के पास ले गईं। बारी-बारी से आते लोगों के सिर पर हाथ रखकर बाबा आशीष देते रहे।
प्रवचन और आशीष के बाद विदा होते लोगों ने एक दूसरे से अपने अनुभव बांटे। शुक्रवार से शुरू हुआ तीन दिनी साप्ताहिक दरबार का सिलसिला रविवार को पूरा हुआ तो लोग उम्मीद की पोटली के साथ सिर पर गठरी और कंधे पर बैग टांगे अपने घरों को लौट गए। मान्यता और मजहब की दीवारें तोड़ता दिखा, आस्था का एक दरबार ऐसा भी।
मंच पर एक पास्टर बारी-बारी से उन लोगों से परिचित कराते रहे, जिन्हें चंगाई मिली। पास्टर ने पूछा, अम्मा जी आप कहां से आई हैं। जवाब मिला, सुल्तानपुर। क्या परेशानी थी, कई वर्षों से गठिया से चलना-फिरना दूभर था। अब, ‘अब परमेश्वर की किरपा है, चल-फिर लेइत है।’ इसी तरह बारी-बारी से आते लोगों में से किसी ने पेट दर्द, किसी ने कम रोशनी, किसी ने बहरेपन तो किसी ने कैंसर तक से छुटकारे का दावा किया। हालांकि लोगों ने एक दूसरे को सलाह भी दी, भइया राहत तभी मिलेगी, जब सच बोलेगे और चोरी-बेइमानी से दूर रहोगे। दुखियारों में आर्थिक, शारीरिक ही नहीं अन्य रोगों से पीड़ित लोग भी शामिल थे। तमाम संतानहीन दंपति भी दरबार का हिस्सा बने।
बगबना, घूरपुर की पूर्णिमा ने दावा किया कि दरबार में आने पर शरीर की बीमारी दूर हुई तो मंसूराबाद के रामबाबू ने भी पांच बरस के बेटे के दाग दूर होने का दावा किया। रीवा के शौकी लाल और उनके मित्र शिव कुमार ने भी दावा किया कि कई तरह की शारीरिक, पारिवारिक दिक्कतें दूर हुईं। ऐसे ही तमाम लोगों ने भी कहा, भइया तमाम देवी देवताओं को पूजते रहे, अब सुबह-शाम केवल बाइबिल का पाठ करते हैं और परमेश्वर का भजन। पहले से आराम मिला है।
पंडाल में कई जगहों पर यीशु मंदिर की दान पेटिकाएं रखी थीं, लेकिन चढ़ावे के लिए कोई बाध्यता नहीं। श्रद्धा के मुताबिक कुछ लोगों ने अंशदान किया, जिसे दरबार के बाद एक पास्टर से एकत्र किया। वहीं मंच के एक ओर आटा-चावल या खाने-पीने की ऐसी की चीजों की छोटी-छोटी पोटलियां रखीं थीं, जिसे लोगों ने स्वेच्छा से दिया था। बाहर से आने वालों के लिए दरबार की ओर से ठहरने और खाने की नि:शुल्क व्यवस्था रही, जहां श्रद्धालुओं के मुताबिक सिर्फ दस रुपये जमा करने होते हैं। श्रद्धालुओं का रेला ऐसा रहा कि ग्रामीण इलाकों से बसों में भरकर लोग आए थे। इसी तरह परिवार और परिचितों की टोलियां विक्रम, ई रिक्शा या फिर अपने साधनों से भी आई थीं।