सातवें वेतन आयोग में पेंशन बेचना नुकसान का सौदा साबित हो रहा है। वे कर्मचारी जो एक जनवरी 2016 से चार अगस्त 2016 के बीच सेवानिवृत्त हुए, उनकी पेंशन का सारांशीकरण छठे वेतन आयोग के तहत हुआ लेकिन अब उनसे पूछा जा रहा है कि यदि वे चाहें तो सातवें वेतन आयोग के तहत बढ़ी हुई अतिरिक्त पेंशन का सारांशीकरण करा सकते हैं। ज्यादातर पेंशनर्स इसके लिए तैयार नहीं हैं। अगर वे ऐसा करेंगे तो उनकी पेंशन की धनराशि कम हो जाएगी और उन्हें नुकसान उठाना पड़ेगा।
छठे वेतन आयोग के तहत पेंशन का सारांशीकरण मूल पेंशन पर किया जाता था लेकिन सातवां वेतन आयोग लागू होने के बाद सारांशीकरण अब पूरी पेंशन पर हो रहा है। ऐसे में पेंशन बेचने पर मूल पेंशन से 40 फीसदी की कटौती होती थी लेकिन अब पूरी पेंशन से 40 फीसदी की कटौती होगी। उदाहरण के तौर पर जनवरी 2016 से चार अगस्त 2016 के बीच पेंशन बेचने वाले किसी पेंशनर की मूल पेंशन 10 हजार रुपये थी तो उसकी कुल पेंशन 22,500 रुपये रही होगी।
सातवां वेतन आयोग लागू होने के बाद पेंशन बढ़कर 25,700 रुपये हो गई। छठे वेतन आयोग के तहत पेंशन बेचने पर संबंधित पेंशनर की मूल पेंशन से 40 फीसदी यानी चार हजार रुपये की कटौती की गई। कटौती के बाद पेंशनर को 18,500 रुपये पेंशन मिलती रहेगी। यदि वही पेंशनर सातवें वेतन आयोग के तहत सारांशीकरण में संशोधन चाहता है तो उसकी कुल पेंशन यानी 25,700 रुपये में से 40 फीसदी की कटौती होगी, जो 10,280 रुपये है। यानी पेंशनर को कटौती के बाद 15,420 रुपये पेंशन मिलेगी। ऐसे में पेंशनर को हर माह 3080 रुपये का नुकसान होगा। तेजी से बढ़ रही महंगाई में यह नुकसान उठाने को पेंशनर्स तैयार नहीं हैं।
ऑल इंडिया ऑडिट एंड एकाउंट एसोसिएशन के पूर्व सहायक महासचिव हरिशंकर तिवारी का कहना है कि यह सातवें वेतन आयोग की विसंगति है। सरकार को इसमें संशोधन करना चाहिए।