विशेष आरक्षित वर्ग को सामान्य की सीटों पर नियुक्ति देने के लिए सरकार ने भर्ती नियमावली और खुद के जारी किए शासनादेशों की ही धज्जियां उड़ा दी। इस पर टिप्पणी करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि सरकार और बोर्ड ने न सिर्फ 1993 के एक्ट और खुद के शासनादेशों का खुला उल्लंघन किया (जो उन पर बाध्यकारी था) बल्कि जानबूझकर क्षैतिज आरक्षण लागू करने के सिद्धांतों का पालन नहीं किया, जबकि पूर्व की भर्तियों में बोर्ड ने इन्हीं नियमों का पालन किया है। कोर्ट ने कहा कि मुझे यह कहने में कोई हिचक नहीं है कि सरकार और पुलिस भर्ती और महाधिवक्ता और उनके सहयोगी वकीलों ने खुद के शासनादेशों और 1993 के एक्ट के विपरीत स्टैंड लिया है।
कोर्ट ने कहा कि इससे याची वकील के इन आरोपों की पुष्टि करता है कि भर्ती में बोर्ड के सदस्यों द्वारा जानबूझकर धांधली की गई है। इन परिस्थितियों में कोर्ट यह कहने को विवश है कि बोर्ड केसदस्यों ने अपनी करतूतें उजागर कर दी हैं। कोर्ट ने कहा कि अधिकारियों की गलती का खामियाजा जनता के पैसे से नहीं चुकाया जाना चाहिए, इसलिए हर्जाने की राशि बोर्ड सदस्यों और उन अधिकारियों के वेतन से वसूल की जाए जो इस गड़बड़ी के लिए जिम्मेदार हैं।
कोर्ट ने कहा कि महिलाओं की विशेष श्रेणी को सामान्य, ओबीसी और एससीएसटी वर्ग में उनके कोटे के अनुसार चयनित किया जाना चाहिए था। ऐसा न करके संविधान के अनुच्छेद 162 का उल्लंघन किया गया है। महिलाओं को 20 प्रतिशत आरक्षण देने का नियम है इस हिसाब मौजूदा भर्ती में 740 महिलाओं की भर्ती होनी चाहिए। कुल चयनित महिलाएं 261 उपलब्ध थीं। इसमें से 19 महिलाएं मेरिट लिस्ट आ गईं।
ष बची 242 महिलाओं को उनकी श्रेणी के अनुसार आरक्षण देना था। इस हिसाब से सामान्य वर्ग में 69 ओबीसी में 169 महिला और एससी कोटे में 10 महिलाओं को आरक्षण देना था। बोर्ड ने इन सभी को सामान्य वर्ग में चयन दे दिया गया। कोर्ट ने इस आदेश को रद्द कर दिया है। अब महिला अभ्यर्थियों को उनके कोटे में चयन दिया जाएगा। इससे जो पुरुष अभ्यर्थी महिलाओं की सीट पर चयनित हो चुके हैं वह चयन सूची से बाहर हो जाएंगे।