मजीस्टीयिरल जांच रिपोर्ट के आधार पर यह माना गया कि प्रथमदृष्टया बंदी की अभिरक्षा के दौरान मौत संदेहजनक परिस्थितियों में उसके साथ मारपीट कर गंभीर चोट पहुंचाए जाने से संबंधित है। आयोग ने आदेश दिया कि इस संबंध में तत्कालीन जेल प्रशासन के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर विवेचना की जाए। इसके बाद तत्कालीन थाना प्रभारी नैनी बृजेश सिंह ने इसी साल 16 जनवरी को अपने ही थाने में तत्कालीन जेल प्रशासन के खिलाफ गैर इरातदन हत्या के आरोप में मुकदमा दर्ज कराया।
तब से लेकर अब तक 11 महीने का वक्त बीत चुका है लेकिन बंदी की मौत का सच सामने नहीं आ सका है। नैनी पुलिस अब तक मामले की विवेचना पूरी नहीं कर सकी। इंस्पेक्टर यशपाल सिंह का कहना है कि विवेचना अतिरिक्त निरीक्षक कर रहे हैं। अब तक की कार्रवाई से तत्कालीन जेल प्रशासन के खिलाफ कोई साक्ष्य नहीं मिल सका। हालांकि विवेचना जारी है।
उधर एसीपी अजीत सिंह चौहान के मुताबिक, विवेचक से बात की गई तो उन्होंने बताया कि मामले में जेल में निरुद्ध बंदियों व अन्य संबंधित लोगों के बयान दर्ज किए जा चुके हैं। विवेचना पूरी होने के क्रम में अभी अन्य साक्ष्य संकलित किए जाने हैं। ऐसे में विवेचना जारी है।
एक नहीं दो विवेचक, अब तक नहीं ढूंढ पाए साक्ष्य
बंदी की गैर इरातदन हत्या के आरोप सही हैं या नहीं, इससे संबंधित साक्ष्य एक नहीं बल्कि दो-दो विवेचक भी अब तक नहीं ढूंढ़ पाए। दरअसल मुकदमा दर्ज होने के बाद पहले इसकी विवेचना नैनी थाने में तैनात अतिरिक्त निरीक्षक मो. अली को मिली। महीनों तक विवेचना करने के दौरान भी वह साक्ष्य नहीं ढूंढ़ पाए। इसी दौरान उनका स्थानांतरण हो गया और फिर विवेचना अतिरिक्त निरीक्षक के पद पर तैनाती पाने वाले मो. साजिद अली को मिली। मौजूदा समय में मुकदमे के विवचेक वही हैं, हालांकि अब तक वह भी साक्ष्य नहीं ढूंढ़ सके हैं।