भाषा का इतिहास मानव के इतिहास से जुड़ा
भाषा का जन्म कैसे हुआ भाषा कैसे विकसित हुई, इस सब की कहानी कम रोचक नहीं है। किंतु यहां इतना ही उल्लेख करना चाहूंगा कि भाषाओं का इतिहास मानव के इतिहास से जुड़ा हुआ है। मानव जितना पुराना है, भाषा भी उतनी पुरानी हो सकती है। भाषा की विकास कथा में किसी भी समाज का सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनितिक प्रतिबिब झलकता है। मनुष्य सामाजिक प्राणी है और समाज में रहकर उसे अन्य व्यक्तियों से विचार-विनिमय करना पड़ता है। विचार-विनिमय के माध्यम में भाषा सबसे प्रमुख घटक है।
भाषा विचारों की पोषक होती हैं। भाषा के बिना विचार अस्तित्वहीन होता है। भाषा और विचार का अत्यंत घनिष्ठ संबंध है। एक के अभाव में दूसरे की कल्पना व्यर्थ है। विचारों के अभाव में भाषा का कोई महत्व नहीं होता और भाषा के अभाव में विचारों का भी कोई महत्व नहीं रह जाता। एमर्सन ने भाषा के महत्व पर लिखा है - भाषा एक नगर है जिसके निर्माण में प्रत्येक मानव एक पत्थर लाया है। भाषा संस्कृति की देन तो है ही साथ ही वह केवल संस्कृति की रक्षा ही नहीं करती, अपितु उसे अगली पीढ़ी के लिए संरक्षित भी करती है। भाषा अपने विचार प्रकट करने तथा दूसरे के विचार सुनने का एक मात्र साधन है। भाषा का प्रयोग हम आवश्यकतानुसार कभी बोलकर करते हैं और कभी सिखकर। भाषा का बोला गया रूप मौखिक और लिखा गया रूप लिखित कहलाता है। भाषा के विशेष ज्ञान के लिए उस भाषा का व्याकरण जानना आवश्यक होता है।
संसार में लगभग 12 भाषा परिवार
भाषा का वैज्ञानिक अध्ययन भाषा-विज्ञान है। वैज्ञानिक अध्ययन से तात्पर्य भाषा के बाहरी और भीतरी रूप एवं विकास आदि का सम्यक अध्ययन है। इसी प्रकार भाषा के दो आधार हैं, एक मानिसक दूसरा भौतिक। मानसिक आधार भाषा की आत्मा है तो भौतिक आधार उसका शरीर। भाषा का भवन इसी पर खड़ा है। भाषा वैज्ञानिको ने एक भाषा से निकली और विकसित हुई। भाषाओं को एक परिवार माना है। इस प्रकार भाषा वैज्ञानिक दृष्टि से संसार में लगभग 12 भाषा परिवार है। गणना करने वालों के अनुसार विश्व में लगभग 5000 भाषाएं और भारत में लगभग 1653 भाषाएं हैं।
विश्व में जितनी भी भाषाएं बोली जाती हैं, उसमें से मात्र 92 भाषाएं साहित्यिक महत्व की मानी जाती हैं। यदि बोलने वालों की संख्या की दृष्टि से देखें तो सारे संसार में पहला स्थान चीनी भाषा का दूसरा अंग्रेजी का और तीसरा हिंदी का है। हिंदी भाषा का प्रचलन भारत, नेपाल, मलयेशिया, इंडोनेशिया, सूरीनाम, फिजी, गुयाना, मारीशस, त्रिनिडाड आदि लगभग 50 देशों में हैं।
भाषा ही कराती है मानवीय मूल्यों का बोध
भाषा और आदत का भी घनिष्ठ संबंध है। कहावत है आदत दूसरा स्वभाव बन जाती है। भाषा के बिना मनुष्य सर्वथा अपूर्ण है और अपने इतिहास तथा परंपरा से विछिन्न है। परस्पर विचारों का आदान प्रदान पहले कभी इशारों, चिन्हों और जानी पहचानी ध्वनियों से किया जाता था, लेकिन भाषा यानि ध्वनि संकेत की वह पद्धति है जिसके द्वारा मानव परस्पर विचारों का आदान प्रदान करता है। भाषा एक पद्धति है, सुव्यवस्थित योजना का संगठन है, जिससे कर्ता, कर्म, क्रिया व्यवस्थित रूप में आ सकें और व्याकरण के आधार पर लिखने या बोलने में जिसका बोध हो सके। बोली भाषा की छोटी इकाई है। किसी ने ठीक ही कहा है- भाषा की लहरों में जीवन की हलचल में। ध्वनि में क्रिया भरी है और क्रिया में बल है।।
भाषा का आयाम बहुत विस्तृत है तथा यह अभ्यास की वस्तु है। भाषा का सवाल सिर्फ माध्यम का सवाल नहीं है, बल्कि संस्कृति का सवाल है। भाषा से ही संस्कृति है और संस्कृति से ही राष्ट्र बनता है। आचार्य नरेंद्र देव का कथन है- संस्कृति चिंतना की खेती है। भाषा ही मानवीय मूल्यों, नैतिकता और सामाजिक आर्थिक का सक्रिय बोध कराती है। भाषा हमारे सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विकास का कार्य करती है। नि:संकोच यह कह सकते हैं कि भाषा विकास का भी फल है और बीज भी। भाषा समाज के बीच एक पुल का काम करती है, इसलिए वह व्यक्ति को समाज से जोड़ती है, तोड़ती नहीं। - पं. रामनरेश तिवारी, पिंडीवासा, नगर प्रधान, केंद्रीय सचिवालय हिंदी परिषद।