इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि केवल मृतक को पकड़ने की भूमिका के आधार पर किसी को हत्या का दोषी नहीं ठहराया जा सकता है। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन को साझा मंशा, पूर्व नियोजित योजना या आरोपियों के बीच पहले से की गई सहमति का ठोस साक्ष्य प्रस्तुत करना जरूरी होता है।
इस टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति सिद्धार्थ और न्यायमूर्ति विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने इम्तियाज को हत्या के मामले में संदेह का लाभ देकर बरी कर दिया। मामला बुलंदशहर के सिकंदराबाद थाना क्षेत्र का है। अभियोजन के अनुसार 16 मार्च 1986 को जंगेशेर अपने भाई दलशेर के साथ बाजार जा रहा था। रास्ते में उसे इम्तियाज और उसका भाई फारूक मिला। आरोप था कि इम्तियाज ने जंगेशेर को पकड़ लिया और फारूक ने उसकी पीठ पर चाकू से वार कर दिया, जिससे उसकी मौत हो गई।
ट्रायल कोर्ट ने इम्तियाज को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। दोनों ने सजा के खिलाफ अपील दायर की थी। फारूक की मृत्यु हो गई तो उसके संबंध में अपील समाप्त हो गई। वहीं, कोर्ट ने पाया कि इम्तियाज के खिलाफ केवल जंगेशेर को पकड़ने की भूमिका बताई गई थी। उसके पास से हत्या का कोई हथियार बरामद नहीं हुआ था। चाकू फारूक की निशानदेही पर बरामद हुआ था। कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है, जिससे यह साबित हो सके कि इम्तियाज और फारूक के बीच हत्या के लिए पहले से कोई योजना या साझा मंशा थी।