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अंग्रेजों से तो आजादी, पर बदहाली से बने गुलाम

Mon, 15 Aug 2016 01:58 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
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ये कैसी आजादी - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
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आजादी के सात दशक पूरे होने को हैं और इलाहाबाद में दर्जनों गांव विकास की किरण से कोसों दूर हैं। जिले में अति कुपोषित बच्चों की संख्या 35 हजार से अधिक है। उचित भोजन न मिल पाने के कारण बच्चे अति कुपोषण के शिकार हो गए हैं। चूहे मारकर बच्चे अपना पेट भर रहे हैं। कई गांवों में बिजली नहीं है।
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कुछ गांव ऐसे हैं, जहां बच्चे बिना पुल वाली नहरें पार कर स्कूल पढ़ने जाते हैं। नहरों में बिजली के खंभों को पुल की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। गांव में सड़क न होने के कारण मरीजों को कई किलोमीटर की दूरी तक चारपाई या तख्त पर ढोकर अस्पताल पहुंचाया जा रहा है। अपनी ही जमीन के लिए आंदोलन करने वाले किसानों को सरकार की कार्रवाई के भय से गांव छोड़कर भागना पड़ रहा है। आखिर यह कैसी आजादी, जहां गुलामी की बेड़ियां बन चुकी बदहाली और अव्यवस्था दूर होने का नाम नहीं ले रही।

देश के एक कोने में एयर एंबुलेंस चल रही है तो दूसरी ओर मरीजों को चारपाई या तख्त पर ढोया जा रहा है। यूपी और एमपी की सीमा पर कोरांव तहसील में चिरांव ग्राम पंचायत है, जिसका राजस्व ग्राम पौखरौद है। तीन सौ से अधिक आबादी वाले इस गांव में सड़क नहीं है। हल्की बारिश भी हुई तो गांव में वाहनों के चक्के थम जाते हैं। गांव से एक किलोमीटर दूर सरकारी अस्पताल है। अगर कोई बीमार पड़ा तो गांव में एंबुलेंस नहीं आ सकती है। मरीजों को चारपाई या तख्त पर ढोकर अस्पताल तक पहुंचाया जाता है। गांव वालों का ही कहना है कि कई बार गंभीर मरीजों को समय से अस्पताल नहीं पहुंचाया जा सका और इस बदहाली के कारण मरीजों को अपनी जान गंवानी पड़ गई।
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बच्चों को कुपोषण और अतिकुपोषण से निजात दिलाने के लिए सरकार की ओर से करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं। कमिश्नर, डीएम से लेकर जिला स्तर के ज्यादातर अफसरों और सांसदों ने गांवों को गोद ले रखा है। इसके बावजूद बड़ी संख्या में ऐसे गांव हैं, जहां बड़े और बच्चे भूख से तड़प रहे हैं। कभी-कभी तो दो से तीन दिनों तक भूखे रहना पड़ता है। इस बदहाली का एक उदाहरण शंकरगढ़ ब्लॉक का गन्ने गांव हैं, जहां बच्चों को चूहे मारकर अपना पेट भरना पड़ रहा है। आसपास के गांवों की भी यही हालत है। इन गांवों की बड़ी आबादी को दो से तीन दिनों तक भूखे रहना पड़ता है या मजबूरी में घास की रोटी खानी पड़ती है।

जसरा ब्लॉक का करकोहला गांव, जहां बच्चे स्कूल जाते हैं तो उनके अभिभावकों को तब तक चैन नहीं मिलता, जब तक बच्चे सही सलामत लौटकर न जाएं। बच्चों को स्कूल जाने के लिए गहरी नहर पार करनी पड़ती है। नहर पर कोई पुलिया नहीं है, सो बिजली के ख्रंभे रखकर उसे पुलिया की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। कब पैर खिसक जाए और जान जोखिम में पड़ जाए, कोई भरोसा नहीं लेकिन गांव में रहने वाले 400 लोग जान जोखिम में डालने के लिए मजबूर हैं। समस्या दशकों पुरानी है। कई बार बच्चे नहर में गिर पड़े और हादसे भी हुए लेकिन अफसरों और जनप्रतिनिधियों की नजर अब तक वहां नहीं पड़ी।

करछना पावर प्लांट के तहत जमीन अधिग्रहण का विरोध करने और अपना हक मांगने वाले किसानों को घर-गांव छोड़कर जाना पड़ा। लोकतंत्र में आंदोलन करने वालों को जेल जाना पड़ा। आंदोलकारियों के मुखिया राजबहादुर पटेल को भगौड़ा घोषित कर दिया गया और उस पर ईनाम भी रख दिया गया। कार्रवाई के डर से कचरी और आसपास गांवों में रहने वाले 50 से अधिक किसान गांव छोड़कर जा चुके हैं। पूरे गांव पर पीएसी का पहरा है। गांव में जाने या बाहर आने से पहले सुरक्षा कर्मियों की इजाजत लेती पड़ती है। गांव वालों का कहना है कि उनका जीवन गुलामों जैसा हो गया है।

शंकरगढ़ गांव का सीधे टिकट गांव, जाहं 300 से अधिक आदिवासी घर हैं, कई दुकानें हैं और प्राइमरी पाठशाला भी लेकिन गांव में बिजली नहीं है। बिजली तो दूर, गांव में बिजली के खंभे और तार भी नहीं दिखते। गांव में लोगों ने चार्जर वाली टॉर्च रखी है। दिन के वक्त दूसरे गांव में जाकर इसे चार्ज करते हैं ताकि रात में रोशनी मिल सके। गांव में कुछ हो या न हो लेकिन संचार क्रांति का प्रभाव दिखता है। लोगों के पास मोबाइल भी है लेकिन इसे भी चार्ज करने के लिए दूसरे गांव में जाना पड़ता है। यह तो एक  उदारहण हैं, इलाहाबाद में दर्जनों गांव है, जहां अब तक रोशनी की किरण नहीं पहुंची।
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