इलाहाबाद। रमजान के साथ ही दिन और रात की रंगत बदली। सहरी के साथ ही इबादत का सिलसिला शुरू हुआ। दिन भर के रोजे के बाद शाम को घरों या दुकानों पर सामूहिक रूप से रोजा खोला गया। इससे पहले घरों से तश्तरियों में तमाम तरह की चीजें मस्जिदों, इबादतगाहों में भी भिजवाई गईं ताकि वहां जुटे रोजेदार भी वक्त पर रोजा खोल सकें। रोजे अदा करने के लिए और पहला रोजा पूरा होने के साथ खुदा का शुक्रिया अदा किया गया। शाम होते ही रोजेदार घरों की ओर मुखातिब हुए जहां वक्त पर रोजा खोल सकें। जो किसी वजह से वक्त पर घर नहीं पहुंच सके, उन्होंने वहीं खजूर से रोजा खोला।
मिर्जा गालिब रोड स्थित जामिया इमामिया अनवारुल उलूम के मुदीर मौलाना जवाद हैदर जूदी कहते हैं, माहे रमजान में इफ्तार की भी बहुत ज्यादा ताकीद की गई है। इंसान रोजेदारों को इफ्तार कराए चाहे वह एक खजूर के ही जरिये क्यों न हो। जब कोई इंसान एक रोजेदार को इफ्तार कराने में फख्र महसूस करता है तो वह कभी गरीबों पर भी रहम करे और उनके खाने-पीने का बंदोबस्त करे। यही वजह है कि माहे मुकद्दस रमजान में मस्जिदों में इफ्तार पर ज्यादा जोर दिया जाता है।
आमतौर पर खजूर खाड़ी देशों से ही आता है, जिसमें सऊदी अरब के खजूर को अव्वल और इराक-ईरान वाले को सामान्य माना जाता है। फिलहाल फरद, मगादी, नागाल, कलमी, शफावी सहित बाजार में मौजूद दर्जन भर किस्मों में से अलीबाबा अव्वल लेकिन क्राउन भी कम नहीं है। नखासकोहना के शमशाद, सब्जीमंडी के बरकतुल्लाह, अटाला के अकीलुर्रहमान के मुताबिक रमजान के दौरान सिर्फ इलाहाबाद में तकरीबन दो सौ टन से ज्यादा खजूर की खपत होती है।