कोर्ट ने नाबालिग की पुनरीक्षण याचिका मंजूर करते हुए तत्काल रिहा करने का आदेश दिया। कोर्ट ने कहा कि नाबालिग का मामला किशोर न्याय अधिनियम के प्रविधानों से संरक्षित है। इसलिए नाबालिग की जमानत अर्जी पर विचार करते समय अपराध की गंभीरता से ज्यादा उसके सुधारात्मक उपाय और पुनर्वास पर ध्यान दिया जाना चाहिए।
कोर्ट यह भी स्पष्ट किया कि किशोर को जमानत देने से तभी इन्कार किया जा सकता है, जब यह मानने का उचित आधार हो कि रिहाई से किशोर आदतन अपराधियों से जुड़ जाएगा। साथ ही अपने नैतिक, शारीरिक या मनोवैज्ञानिक जीवन को खतरे में डाल देगा। इस मामले में ऐसी कोई परिस्थिति नहीं प्रतीत हो रही है।