इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि वादों की सुनवाई करते समय अदालतें असहाय दर्शक के तौर पर काम नहीं कर सकती हैं। सुनवाई निष्पक्ष हो, यह अधिकार आरोपियों के पास भी है। इससे उन्हें वंचित नहीं किया जा सकता है। उन्हें भी उचित अवसर दिया जाना चाहिए। यह उनका सांविधानिक और मानवीय अधिकार है। सुनवाई करने वाली अदालतें इससे इन्कार नहीं कर सकती हैं।
कोर्ट ने इस टिप्पणी के साथ ही एटा जिले के कोतवाली थाने में आबकारी अधिनियम के तहत दर्ज प्राथमिकी पर चल रही सुनवाई में सत्र अदालत द्वारा 12 जुलाई 2023 को पारित आदेश रद्द कर दिया। साथ ही याची द्वारा दिए गए आवेदन पर विचार कर गवाहों और सबूतों का परीक्षण कराए जाने का आदेश दिया। यह आदेश न्यायमूर्ति शिव शंकर प्रसाद ने मानिक पांडेय की ओर से दाखिल याचिका को स्वीकार करते हुए दिया है।
निचली अदालत ने याची द्वारा दिए गए आवेदन को खारिज कर दिया था। याची की ओर से सत्र न्यायालय के समक्ष छापा मारने वाले पुलिसकर्मियों के साथ हुई बातचीत की रिकॉर्डिंग को संज्ञान लेने और पुलिसकर्मियों का वॉयस सैंपल (आवाज का नमूना) लेकर उसकी जांच कराए जाने की मांग की गई थी। सत्र ने रिकॉर्डिंग ले ली, लेकिन आवाज का नमूना लेने की मांग वाली अर्जी को खारिज कर दिया।
याची ने उसे हाईकोर्ट में चुनौती दी। याची के अधिवक्ता उपेंद्र उपाध्याय ने कहा कि याची जेल में है और उसकी जमानत अर्जी खारिज हो चुकी है। उसने निष्पक्ष जांच के लिए सत्र न्यायालय के समक्ष यह गुहार लगाई कि घर पर छापा मारने वाले पुलिस कर्मियों की आवाज का नमूना लेकर जांच कराई जाए। इस पर कोर्ट ने कहा कि निचली अदालतों का दायित्व है कि वह सत्य का पता लगाएं और न्याय के लिए सभी संभावित पहलुओं पर विचार करें।