जिला अधिवक्ता संघ के पूर्व अध्यक्ष राकेश तिवारी को अवमानना के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने उनकी वकालत पर तीन साल के लिए रोक लगा दी है। इस प्रकरण ने बार और बेंच के रिश्तों में बढ़ती खटास पर एक बार फिर बहस छेड़ दी है। अवमानना में किसी अधिवक्ता को सजा सुनाए जाने का यह पहला मामला नहीं है। इससे पूर्व भी कई अधिवक्ता अदालत की अवमानना में या तो सजा पा चुके हैं या फिर उनको न्यायिक प्रक्रिया का सामना करना पड़ा है।
वरिष्ठ अधिवक्ता एएन त्रिपाठी इसे न्यायिक प्रक्रिया के लिए अच्छा संकेत नहीं मानते हैं। उनका कहना है कि बार और बेंच न्यायरथ के दो पहिए हैं।एक स्वस्थ्य न्यायपालिका के लिए जरूरी है कि इनके बीच संतुलन बना रहे। अधिवक्ता कई बार असंतोष का शिकार होते हैं मगर उसके समाधान के रास्ते हैं। न्यायपालिका का सम्मान सर्वोपरि है। किसी भी स्थिति में इसे कायम रखना जरूरी है।
हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष राकेश पांडेय का कहना है कि बार और बेंच न्यायपालिका की धुरी हैं। आपस में सहिष्णुता और सामंजस्य बनाकर ही चला जा सकता है। जज न्यायिक आदेश पारित करते हैं मगर न्यायपालिका की स्वायत्ता की गारंटी अधिवक्ता लेता है। ऐसे में आपसी सहिष्णुता होनी अनिवार्य है। सभी अपने दायरे में रहे यह जरूरी है। कभी एक दूसरे के क्षेत्र में अतिक्रमण हो जाए तो उसे एक परिवार के सदस्यों की तरह आपस में सुलझा लेना बेहतर होता है।
हाईकोर्ट बार के पूर्व अध्यक्ष राधाकांत ओझा का मानना है अवमानना की प्रक्रिया में बदलाव होना चाहिए। अवमानना के मामले की सुनवाई के लिए अलग फोरम होना चाहिए जो निष्पक्ष तरीके से सुनवाई करे। अवमानना प्रक्रिया में बदलाव होना चाहिए। इसके भय से वकील कई बार अपनी बात नहीं कह पाते हैं। अधिवक्ता यदि गलती करता है तो उसे पर कार्रवाई होनी चाहिए मगर प्रक्रिया में बदलाव जरूरी है।
अवमानना में पहले भी हो चुकी हैं सजाएं
अदालत की अवमानना में वकीलों को सजा कोई नई बात नहीं है। इससे पहले भी जिला अदालत के कई अधिवक्ता अदालत की अवमानना में सजा पा चुके हैं। पूर्व अध्यक्ष राकेश तिवारी के अलावा अधिवक्ता रामचंद्र शर्मा, ज्योति सिंह और केके मिश्र उर्फ बलराम मिश्र को भी अवमानना के मामलों का सामना करना पड़ चुका है।