श्रीनगर में सीआरपीएफ के काफिले पर आतंकी हमले में शहीद सात जवानों में एक राजेश कुमार इलाहाबाद का सपूत था। वह मेजा इलाके के नीबी (कुकुरकटवा) में रहने वाले बिंद्रा प्रसाद के दो पुत्रों में छोटा था। राजेश की शहादत की खबर मिली तो घर और गांव में मातम छा गया। माता-पिता समेत परिवार और रिश्ते के लोग रोने-कलपने लगे। हालांकि उन्हें यह गर्व भी है कि बेटे ने अपनी जान देश के लिए कुर्बान कर दी। घर में रिश्तेदारों और करीबियों का मजमा लगा तो तमाम राजनीतिक दलों से जुडे़ लोग भी शोक जताने पहुंचे। पुलिस-प्रशासन के भी कर्मचारी वहां आए। शहीद का पार्थिव शरीर सोमवार को विमान के जरिये लाया जाएगा। दोपहर बाद मेजा के जेरा गंगा घाट पर अंतिम संस्कार की तैयारी की जा रही है।
नीबी कुकुरकटवा गांव में रहने वाले बिंद्रा प्रसाद के पुत्र राजेश कुमार (35) की नियुक्ति वर्ष 2004 में कुक के पद पर हुई थी। बाद में वह प्रोन्नत होकर कांस्टेबल बन गया। पांच जून 2010 को उसका ब्याह नैनी के महेवा इलाके में निरपति राम की बेटी विभा के साथ हुआ था। उसके दो बेटे हैं चार साल का आदित्य राज और दो साल का अर्पित राज। उसका बड़ा भाई राधेश्याम दोनों पैरों से दिव्यांग है। इस लाचारी की वजह से वह घर में चारपाई पर लेटा रहता है। ऐसे में राजेश ही माता-पिता, विकलांग भाई, पत्नी और बच्चों का इकलौता सहारा था। श्रीनगर के पोपोर में सीआरपीएफ के काफिले पर आतंकी हमले में राजेश के भी शहीद होने की जानकारी उसके गांव पहुंची तो हर कोई सन्न रह गया।
परिवार में कोहराम मच गया। बूढ़े माता-पिता बिलखने लगे। विकलांग भाई राधेश्याम भी आंसू बहाने लगा। राजेश की पत्नी विभा दोनों बेटों समेत कुछ दिन से मायके में थी। उसे पता चला तो वह उसे भरोसा ही नहीं हुआ कि ऐसी अनहोनी हो गई है। वह मायके वालों के साथ बेटों को लेकर विलाप करते हुए ससुराल पहुंची। रविवार दोपहर तक घर के बाहर रिश्तेदारों और इलाके के लोगों का जमावड़ा लग गया था। भाजपा नेता सुशील मिश्रा, सपा नेता नरेंद्र सिंह, कांग्रेस नेता रंजय मिश्रा, मनीष पांडेय समेत कई राजनीतिक दलों के लोगों ने भी आकर शोक संवेदना जाहिर की। एसडीएम मेजा आशीष मिश्रा भी सीओ जीतेंद्र दुबे और थानाध्यक्ष तारकेश्वर राय के साथ आकर दुखी परिजनों और ग्रामीणों से मिले।
पिता बिंद्रा प्रसाद को बेटे की मौत का गम है लेकिन साथ ही उसकी शहादत का गर्व भी है। उन्होंने आंसू बहाते हुए कहा कि मेरा बेटा देश के लिए शहीद हुआ है। मगर उन्हें अफसोस है कि घुसपैठ कर आतंकवादी इस तरह से देश के बहादुर जवानों को मार रहे हैं। राजेश की शहादत ने उसके परिवार को फिलहाल मुसीबत में डाल दिया है। वह माता-पिता के बुढ़ापे की लाठी था। दिव्यांग भाई भी उसके ही सहारे था। पत्नी-बच्चे भी बेसहारा हो गए। अब उन्हें शासन से मिलने वाली मदद का ही आसरा है।
श्रीनगर में शनिवार दोपहर सीआरपीएफ के काफिले की बस पर आतंकी हमले से कुछ देर पहले ही राजेश ने पत्नी विभा और बड़े भाई राधेश्याम से मोबाइल फोन पर बात की थी। पत्नी से बेटों के बारे में पूछा। उससे कहा कि बड़े बेटे आदित्य राज का दखिला किसी अच्छे स्कूल में करा देना। छुट्टी मिलने पर जल्द घर आऊंगा। परिवार के लोग रविवार को दिन भर सीआरपीएफ अफसरों से शहीद राजेश का पार्थिव शरीर लाए जाने के बारे में पूछते रहे। गमगीन माता-पिता, पत्नी समेत सभी रिश्तेदार अब अपने शहीद राजेश का आखिरी बार दीदार करने के लिए व्याकुल हैं।
शहीद राजेश के रिश्तेदार और गांव के लोगों की इच्छा है कि गांव की सड़क का नामकरण शहीद के नाम पर किया जाए। साथ ही शहीद राजेश के नाम पर एक स्कूल भी स्थापित किया जाए ताकि इस वीर सपूत का नाम हमेशा के लिए अमर हो जाए और लोगों की जुबान पर आता रहे।
शहीद राजेश की पत्नी विभा तो पति की मौत की जानकारी मिलने के बाद से सुधबुध ही जैसे खो चुकी है। वह विलाप करते हुए कई बार मूर्छित हो गई। मगर उसके मासूम बच्चों को अभी अहसास नहीं हुआ कि उन पर कैसी मुसीबत टूटी है। छोटे पुत्र अर्पित ने दिन में कई बार कहा कि पापा मिठाई और खिलौना लेकर आएंगे। मासूम की तोतली आवाज में यह बात सुनकर लोग दुखी हो रहे थे जबकि पत्नी विभा रोती रही।
सीआरपीएफ काफिले पर हमले में शहीद राजेश कुमार 10 जून को छुट्टी पूरी होने के बाद घर से वापस ड्यूटी पर गया था। वह 15 दिन के लिए छुट्टी पर आया था। राजेश घर के बगल एक पक्के मकान का निर्माण करा रहा था। मगर छुट्टी समाप्त होने पर मकान आधा बना ही छोड़ चला गया था। बूढ़ी मां और बूढ़े पिता बार-बार अधूरे पड़े मकान को ही देख रहे थे। उनका कहना था कि अब अधूरे मकान को कौन पूरा कराएगा।