आठ वर्षों से नहीं हुई है डीपीसी की बैठक
नियमों के अनुसार पदोन्नति की क्रमिक व्यवस्था निर्धारित है। ऐसे में कार्यवाहक तैनाती को लेकर सवाल उठ रहे हैं। विवाद की एक वजह वर्ष 2016 का शासनादेश भी बताया जा रहा है। उस समय शासन ने निर्णय लिया था कि राजकीय एवं सहायता प्राप्त महाविद्यालयों के प्राचार्यों को प्राचार्य के साथ प्रोफेसर का पदनाम भी दिया जाएगा। शासन का तर्क था कि प्राचार्य और प्रोफेसर दोनों का वेतनमान एवं ग्रेड पे समान है।
प्राचार्य पद के लिए अपेक्षित अनुभव प्रोफेसर की तुलना में अधिक है। दरअसल पदनाम इसलिए समकक्ष मानने कि अनुमति प्रदान की गई, जिससे कि प्रोफेसर पदनाम न होने के कारण महाविद्यालयों के स्थायी प्राचार्य विभिन्न समितियों में सदस्य बनने से वंचित न रह जाएं। उधर, विभाग में लंबे समय से नियमित पदोन्नति न होने की भी चर्चा है। करीब आठ वर्षों से विभागीय पदोन्नति समिति (डीपीसी) की बैठक नहीं हो सकी है, जिससे कई पदों पर नियमित नियुक्तियां लंबित हैं।