पुलिस की रिमांड अर्जी को मजिस्ट्रेट ने सशर्त मंजूर करते हुए आदेश दिया कि पुलिस पूछताछ के दौरान अभियुक्त को प्रताड़ित नही करेगी और इस दौरान अभियुक्त अपने खर्चे पर वीडियोग्राफी करवा सकता है और इस दौरान अभियुक्त से समुचित दूरी बनाते हुए उसके अधिवक्ता भी मौजूद रह सकते है, लेकिन वो पुलिस की कार्यवाही में हस्तक्षेप नही कर सकेंगे। मजिस्ट्रेट द्वारा पारित आदेश के क्रम में पुलिस द्वारा पिता के हत्यारोपी से पूछताछ के दौरान उसके अधिवक्ता मौजूद रहे और पुलिस की गतिविधियों की वीडियो रिकॉर्डिंग करते रहे।
पुलिस पर लगा आरोप
याची ने न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में सीआरपीसी की धारा 156(3) के अंतर्गत अर्जी दाखिल कर पुलिस अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करवाने की मांग की, आरोप लगाया कि मजिस्ट्रेट द्वारा पारित आदेश के क्रम में अधिवक्ता वीडियो रिकॉर्डिंग कर रहे थे। अभियुक्त की निशानदेही पर कथित बरामदगी स्थल पर पहुंची पुलिस ने वकीलों को रिकॉर्डिंग करने से रोक दिया और कैमरा छीन कर गंगा नहर में फेंक दिया।
हाईकोर्ट में दी दलील
हत्यारोपी के अधिवक्ता की अर्जी पर मजिस्ट्रेट ने एसडीएम मुरादनगर को मामले की प्रारंभिक जांच का आदेश दे दिया। जिसके खिलाफ अभियुक्त मोनू पाल ले अधिवक्ता ने हाईकोर्ट में मजिस्ट्रेट के आदेश को चुनौती दी। दलील दी कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा ललिता कुमारी के मामले में दिए गए दिशा निर्देशों के क्रम में मजिस्ट्रेट को प्रारंभिक जांच न करवा कर एफआईआर दर्ज करने का आदेश पारित करना चाहिए था। विवेचना का काम पुलिस का है न कि अदालत का।
कोर्ट ने कहा
कोर्ट ने मामले की सुनवाई के बाद याचिका खारिज कर दी। कहा कि न्यायिक मजिस्ट्रेट अपराध की प्रकृति जानने के लिए प्रारंभिक जांच का आदेश दे सकता है, क्योंकि प्रारंभिक जांच का मकसद संज्ञेय अपराध का खुलासा करना है, न कि सत्यापित करना। कोर्ट ने न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा पारित प्रारंभिक के आदेश पर अपनी मुहर लगा दी।