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हाईकोर्ट : संज्ञेय अपराध के खुलासे के लिए की जा सकती है प्रारंभिक जांच, पुलिस के खिलाफ एफआईआर की अर्जी

Thu, 09 Nov 2023 03:57 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज

सार

यह फैसला न्यायमूर्ति अनीस कुमार गुप्ता की अदालत ने गाजियाबाद के अधिवक्ता खालिद खान और एक अन्य की ओर से गाजियाबाद के न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा पुलिस अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करवाने वाली अर्जी पर पारित प्रारंभिक जांच के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज करते हुए सुनाया है।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट। - फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा की 156 (3) के अंतर्गत दाखिल अर्जी पर एफआईआर दर्ज करने का आदेश देना न्यायिक मजिस्ट्रेट कर्तव्य है, लेकिन यदि अर्जी में लगाए गए आरोपों से संज्ञेय अपराध का बोध नहीं होता है तो मजिस्ट्रेट एफआईआर दर्ज करने का आदेश पारित करने से पहले प्रारंभिक जांच का आदेश दे सकता है।

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यह फैसला न्यायमूर्ति अनीस कुमार गुप्ता की अदालत ने गाजियाबाद के अधिवक्ता खालिद खान और एक अन्य की ओर से गाजियाबाद के न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा पुलिस अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करवाने वाली अर्जी पर पारित प्रारंभिक जांच के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज करते हुए सुनाया है।

मामला गाजियाबाद के मुरादनगर थाना क्षेत्र का है। जुलाई 2023 में मुरादनगर निवासी सत्येंद्र पाल की हत्या हो गई। मृतक के बेटे सोनू पाल ने आकाश और अन्य के खिलाफ हत्या की नामजद एफआईआर दर्ज करवाई थी। पुलिस विवेचना के दौरान पुलिस ने मृतक के दूसरे बेटे मोनू पाल को शक के आधार पर गिरफ्तार कर 10 जुलाई को न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश करते हुए रिमांड की मांग की थी।

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पुलिस की रिमांड अर्जी को मजिस्ट्रेट ने सशर्त मंजूर करते हुए आदेश दिया कि पुलिस पूछताछ के दौरान अभियुक्त को प्रताड़ित नही करेगी और इस दौरान अभियुक्त अपने खर्चे पर वीडियोग्राफी करवा सकता है और इस दौरान अभियुक्त से समुचित दूरी बनाते हुए उसके अधिवक्ता भी मौजूद रह सकते है, लेकिन वो पुलिस की कार्यवाही में हस्तक्षेप नही कर सकेंगे। मजिस्ट्रेट द्वारा पारित आदेश के क्रम में पुलिस द्वारा पिता के हत्यारोपी से पूछताछ के दौरान उसके अधिवक्ता मौजूद रहे और पुलिस की गतिविधियों की वीडियो रिकॉर्डिंग करते रहे।
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पुलिस पर लगा आरोप

याची ने न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में सीआरपीसी की धारा 156(3) के अंतर्गत अर्जी दाखिल कर पुलिस अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करवाने की मांग की, आरोप लगाया कि मजिस्ट्रेट द्वारा पारित आदेश के क्रम में अधिवक्ता वीडियो रिकॉर्डिंग कर रहे थे। अभियुक्त की निशानदेही पर कथित बरामदगी स्थल पर पहुंची पुलिस ने वकीलों को रिकॉर्डिंग करने से रोक दिया और कैमरा छीन कर गंगा नहर में फेंक दिया।

हाईकोर्ट में दी दलील

हत्यारोपी के अधिवक्ता की अर्जी पर मजिस्ट्रेट ने एसडीएम मुरादनगर को मामले की प्रारंभिक जांच का आदेश दे दिया। जिसके खिलाफ अभियुक्त मोनू पाल ले अधिवक्ता ने हाईकोर्ट में मजिस्ट्रेट के आदेश को चुनौती दी। दलील दी कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा ललिता कुमारी के मामले में दिए गए दिशा निर्देशों के क्रम में मजिस्ट्रेट को प्रारंभिक जांच न करवा कर एफआईआर दर्ज करने का आदेश पारित करना चाहिए था। विवेचना का काम पुलिस का है न कि अदालत का।

कोर्ट ने कहा

कोर्ट ने मामले की सुनवाई के बाद याचिका खारिज कर दी। कहा कि न्यायिक मजिस्ट्रेट अपराध की प्रकृति जानने के लिए प्रारंभिक जांच का आदेश दे सकता है, क्योंकि प्रारंभिक जांच का मकसद संज्ञेय अपराध का खुलासा करना है, न कि सत्यापित करना। कोर्ट ने न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा पारित प्रारंभिक के आदेश पर अपनी मुहर लगा दी।
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