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Pratapgarh : प्रभु राम की सई हूं, मेरी काया देखिए...जिसका दर्द न जाने कोय

Sun, 28 Sep 2025 01:54 PM IST
विनोद सिंह शशांक वर्मा, प्रयागराज

सार

मैं राम की सई हूं। अविरल कलकल बहती थी। जीवनदायनी थी, अब खुद की जिंदगी के लाले पड़े हैं। वक्त ने मुझे छलनी कर दिया। आंचल में सीवर और उद्योगों का प्रदूषित पानी है। सीने पर कचरा जमा है, उखड़ती सांसों का प्रवाह हूं। लखनऊ में तो लोग मुझे पीजीआई नाला कहते हैं। मेरे लिए योजनाएं बनती हैं। सरकारी मुलाजिमों की झोलियां भरती हैं। मैं वही सई हूं जिसके बारे में तुलसीदास ने रामचरितमानस (अयोध्याकांड) में लिखा- सई उतरि गोमती नहाए, चौथे दिवस अवधपुर आए। अर्थात, वनवास से लौटते समय सई नदी को पार कर भगवान राम ने गोमती में स्नान के बाद आगे प्रस्थान किया। मुझे बचाइए...।

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प्रतापगढ़ में सई नदी की दशा। - फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
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प्रदेश की प्रमुख पौराणिक सई नदी का जीवन संकट में है। बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर केंद्रीय विश्वविद्यालय (बीबीएयू) लखनऊ के पर्यावरण विज्ञान विभाग ने सिंचाई विभाग को सौंपी अध्ययन रिपोर्ट में कहा है कि नदी के प्रवाह में अप्रत्याशित कमी है। इसके फेफड़ों (उद्गम स्थल) और धमनियों (सहायक नदियों) के पुनरुद्धार की जरूरत है।

बारहमासी सई नदी लखीमपुर खीरी की मोहम्मदी तहसील के पनई झाबर से निकल कर हरदोई, लखनऊ, उन्नाव, रायबरेली, प्रतापगढ़ होते हुए जौनपुर में गोमती से मिलती है। हरदोई का कुरसेली ताल भी इसका प्रमुख उद्गम स्थल है। कई छोटी-छोटी नदियां इसमें आकर मिलती हैं, जो इसकी धमनियों की तरह काम करती हैं।

बीबीएयू के प्रो. वेंकटेश दत्ता बताते हैं कि नमामि गंगे प्रोजेक्ट के तहत इसके पर्यावरणीय प्रवाह का अध्ययन किया जा रहा है। पिछले महीने उत्तर प्रदेश के सिंचाई विभाग को दी गई रिपोर्ट चिंताजनक है। प्रतापगढ़ में 7.23 क्यूमेक्स (गैरमानसूनी सत्र), 32.94 क्यूमेक्स पानी (मानसूनी सत्र) होना चाहिए। जौनपुर में 11.91 क्यूमेक्स (गैरमानसूनी सत्र), 38.45 क्यूमेक्स पानी (मानसूनी सत्र) होना चाहिए लेकिन यह पूरा नहीं हो पाता। गैरमानसूनी सत्र में नदी का संकट बढ़ जाता है। उद्योगों के अपशिष्ट, गंदा पानी, पेस्टिसाइड और कचरा नदी को प्रदूषित कर रहे हैं। भूगर्भ जल दोहन लगातार खतरा पैदा कर रहे हैं।

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निर्माण कार्यों में नदी भूभाग की अनदेखी की जाती है। लखीमपुर खीरी से गुजरने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग में इसका ध्यान नहीं रखा गया। पिछले दिनों वहां खंभों का चिह्नांकन कर इसके सुधार की योजना बनी, लेकिन आगे कोई काम नहीं हुआ। भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण को इस पर ध्यान देना चाहिए। - प्रो. वेंकटेश दत्ता, अध्यक्ष, पर्यावरण विज्ञान विभाग बीबीएयू लखनऊ

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प्रतापगढ़ में भ्रष्टाचार की सीवरलाइन

2009 में सीवर योजना आई, 18 करोड़ खर्च हुए

2010 में काम शुरू हुआ, छह किमी लाइन बिछाई

2011 में 8.95 एमएलडी क्षमता का एसटीपी बना

ऑडिट में 16 करोड़ का गबन, अफसर-बाबू जेल गए

एनजीटी की टीम ने सर्वे में असंतुष्टि जताई, केस लंबित

अब भी नदी में आ रहा है सीवर का पानी का

फिलहाल इस वक्त सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) ठीक से संचालित हो रहा है। कहीं कोई गड़बड़ है तो उसे जल्द दूर कराया जाएगा। - रमेश कुमार, ईओ नगर पालिका प्रतापगढ़

स्मृतियों में

मैं वर्ष 1984 से सई के बदलते रंग को देख रहा हूं। अब तो पानी काला हो गया है। पुराने पुल का मलबा, शहर की गंदगी नदी को नष्ट कर रही है। इसे बचाने के लिए योजनाएं तो हैं पर अब तक तो बेअसर ही दिखीं। - डॉ.विनोद शुक्ला, पूर्व प्राचार्य एमडी पीजी कॉलेज प्रतापगढ़।

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