मैं राम की सई हूं। अविरल कलकल बहती थी। जीवनदायनी थी, अब खुद की जिंदगी के लाले पड़े हैं। वक्त ने मुझे छलनी कर दिया। आंचल में सीवर और उद्योगों का प्रदूषित पानी है। सीने पर कचरा जमा है, उखड़ती सांसों का प्रवाह हूं। लखनऊ में तो लोग मुझे पीजीआई नाला कहते हैं। मेरे लिए योजनाएं बनती हैं। सरकारी मुलाजिमों की झोलियां भरती हैं। मैं वही सई हूं जिसके बारे में तुलसीदास ने रामचरितमानस (अयोध्याकांड) में लिखा- सई उतरि गोमती नहाए, चौथे दिवस अवधपुर आए। अर्थात, वनवास से लौटते समय सई नदी को पार कर भगवान राम ने गोमती में स्नान के बाद आगे प्रस्थान किया। मुझे बचाइए...।