खुद को बेगुनाह साबित करने में लग गए 33 साल
लल्लू पासी को बेगुनाही साबित करने में 33 साल तक लग गए। इस दौरान अभियोजन की ओर से गवाह बनाए गए विवेचक वेदमूर्ति, डॉ. एमएस उपाध्याय, हैरिस आनंद हर्षा, बदलू स्वीपर, मुन्ना लाल वाल्मीकि और विनोद जायसवाल दस्तावेजों में दर्ज पते से लापता पाए गए। पुलिस अपने ही विवेचक को पेश नहीं कर पाई। जगमोहन जैसवार और रफीक बच्चन की मौत हो जाने से उनकी भी गवाही नहीं हो पाई।
हाईकोर्ट के प्राचीनतम वादों के निस्तारण के क्रम में लल्लू पासी के मामले की सत्र न्यायालय में सुनवाई शुरू हुई। पता चला कि आरोपी राजू की दोषमुक्ति के खिलाफ राज्य सरकार की ओर से दाखिल अपील में हाईकोर्ट ने पत्रावली तलब कर रखी है। पत्राचार के बाद हाईकोर्ट के डिप्टी रजिस्ट्रार (क्रिमिनल अपील) ने उपलब्ध दस्तावेजों की प्रमाणित प्रतिलिपि सत्र न्यायालय को भेजी। इसमें आरोप पत्र समेत कई अभिलेख नहीं होने की सूचना जिला न्यायाधीश को दी गई।
अदालत को न आरोप पत्र मिला न ही डायरी
काफी तलाश के बाद अदालत को न आरोप पत्र मिला, न ही केस डायरी। अंतत: हाईकोर्ट से मिली प्रमाणित प्रतिलिपि के आधार पर सुनवाई शुरू हुई। इकलौती गवाह नीलम वर्मा ने बताया कि एफआईआर उन्होंने लिखाई थी, लेकिन वह थाने नहीं गईं। उन्होंने राजू के मामले में भी गवाही दी थी, लेकिन पुलिस ने उनका बयान लिया था कि नहीं, यह याद नहीं। वह हत्यारोपियों को भी जानती पहचानती नहीं। अदालत ने साक्ष्यों के अभाव में लल्लू को बरी कर दिया।