पूर्णिमा के श्राद्ध के साथ कल से शुरू होगा पितृपक्ष, पिंडदान और तर्पण-अर्पण से तृप्त होंगी पूर्वजों की आत्माएं इस दौरान पिंडदान के साथ ही अन्न, वस्त्र और पूर्वजों की प्रिय वस्तुओं का भी दान होगा। पितृपक्ष आरंभ होने से पहले ही तीर्थपुरोहितों की चौकियों पर वंशजों की भीड़ लगने लगी है। पितरों को समर्पित इस पक्ष में सात पीढ़ियों के नाम से तर्पण-अर्पण और श्राद्ध होगा।
गंगा, यमुना, विलुप्त सरस्वती के संगम तट पर पितृपक्ष में श्राद्ध और पिंडदान से पूर्वजों को मोक्ष मिलने की पौराणिक अवधारणा रही है। माना जाता है कि संगम तट पर पिंडदान करने से पितरों को शांति मिल जाती है। ऐसे में सोमवार को पूर्णिमा तिथि पर सुबह से ही संगम तट पर पिंडदान, तर्पण का सिलसिला शुरू होगा। पूर्णिमा पर अकाल मृत्यु की वजह से भटकती आत्माओं की शांति के लिए विधि-विधान से पूजन और पिंडदान की परंपरा है।
ऐसे में संगम तट पर पिंडदान के लिए देश के कई हिस्सों से लोग पहुंचेंगे। वेदियों पर ध्वजा, पताका सजाकर मंत्रोच्चार के बीच पिंडदान और तर्पण कर अपने पूर्वजों को लोग श्रद्धासुमन अर्पित करेंगे। पुराणों के अनुसार त्रिवेणी संगम पर पिंडदान और तर्पण करने से पूर्वजों की आत्माओं को शांति मिलती है। यहां तर्पण और पिंडदान किए बिना दिवंगत की आत्मा अतृप्त रहती है। पितृपक्ष में पिंडदान करने से पूर्वज प्रसन्न होकर वंशजों को सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं।
पिंडदान नहीं करने से वंशजों को शारीरिक, मानसिक, आर्थिक कष्टों का सामना करना पड़ता है। यही वजह है कि देश भर से लोग लोग पिंडदान के लिए संगमनगरी पहुंच रहे हैं। तीर्थ पुरोहित राजमणि तिवारी बताते हैं कि पूर्वजों के प्रति श्रद्धा अर्पित करने के लिए पितृपक्ष की तैयारियां पूरी कर ली गई हैं। ज्योतिषाचार्य पं ब्रजेंद्र मिश्र के अनुसार पितृदोष से मुक्ति के बिना परिवार में सुख-समृद्धि नहीं आती। ऐसे में किसी की अकाल मृत्यु, माता-पिता व मातृ-पितृ पक्ष के किसी अन्य परिजन की मृत्यु के श्राद्ध और पिंडदान करने के ही दोष से मुक्ति मिलती है।
पूर्णिमा का प्रथम श्राद्ध आज
सोमवार को पूर्णिमा का पहला श्राद्ध होगा। इसी के साथ पितृपक्ष शुरू हो जाएगा। 21 को प्रतिपदा होगी। इसी क्रम में 22 को द्वितीया, 23 को तृतीया, 24 को चतुर्थी, 25 को पंचमी, 26 को षष्ठी, 27 को सप्तमी, 28 को कोई श्राद्ध नहीं होगा। 29 को अष्टमी, 30 को मातृ नवमी, एक अक्तूबर को दशमी, दो को एकादशी, तीन को द्वादशी, चार को त्रयोदशी, पांच को चतुर्दशी और छह अक्तूबर को अमावस्या श्राद्ध के साथ पितृ विसर्जन होगा।