अंग्रेजों के लिए सबसे बड़ी चुनौती रहे सुभाष चंद्र बोस का इलाहाबाद से भी गहरा रिश्ता रहा। वह न सिर्फ यहां आए बल्कि उन्होंने युवाओं को देश की आजादी के संघर्ष में आहुति के लिए प्रेरित भी किया। 1939 में उनके ओजपूर्ण भाषण ने युवाओं को भीतर से उद्वेलित किया था। वर्ष1939 में महात्मा गांधी की इच्छा के विरुद्ध दोबारा कांग्रेस का अध्यक्ष चुने जाने पर महात्मा गांधी ने कहा था, सीताराम पट्टाभिरमइया का हारना मेरे हारने जैसा है। नेताजी को लेकर गांधीजी के विरोध के बाद पंडित नेहरू और बल्लभ भाई पटेल ने भी समर्थन देने से मना कर दिया था। इसके बाद नेताजी ने कांग्रेस को छोड़ दिया और एक नई फारवर्ड ब्लाक पार्टी बनाई। फिर जनसभा के लिए वह पीडी टंडन पार्क आए थे जहां उन्हें सुनने के लिए विशाल जन समुदाय उमड़ा था।
नेताजी के सहपाठी और सखा रहे पं.क्षेत्रेशचंद्र चट्टोपाध्याय के बेटे इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रो.एमसी चट्टोपाध्याय का कहना है कि जवाहर लाल नेहरू नेताजी की सभा में शामिल तो नहीं हुए लेकिन पीडी पार्क के बाहर खड़े होकर उन्होंने नेताजी का पूरा भाषण सुना था। जनसभा के बाद एंग्लो बंगाली इंटर कॉलेज के विद्यार्थी उनसे मिलने पहुंचे और कॉलेज आने की प्रार्थना की। छात्रों की बात का मान रखते हुए नेताजी कॉलेज गए, मगर तब तक अंधेरा हो चुका था सो कई लालटेन जलाकर सभा हुई। कॉलेज के बाद वह पिताजी से मिलने दारागंज गए थे।
लंबे अरसे बाद मिले दोनों दोस्तों ने कोलकाता के प्रेसीडेंसी कॉलेज के दिनों को याद किया। दोनों ही स्वामी विवेकानंद के मुरीद थे। ऐसे में उन्होंने पिताजी से विवेकानंद की रचना संन्यासी गीत सुना था। पिताजी ने उनसे खाने का आग्रह किया तो नेताजी बोले, ‘बस, मेरा खाना तो हो गया’ और चले गए।