जल शोधक ने खत्म किया घातक असर
प्रो. सुरनजीत के मुताबिक नदियों और तालाबों के पानी की जांच में केमिकल ऑक्सीजन डिमांड (सीओडी), अमोनिया, नाइट्रेट, फॉस्फेट, डाइक्लोफेनेक जैसे तत्व अलग-अलग मात्रा में मिले। इस पानी को सिंघाड़े के छिलके और मॉडीफाइड आयरन से तैयार जल शोधक का इस्तेमाल करके दोबारा परखा गया। इसमें सीओडी की मात्रा 92.50 फीसदी, अमोनिया की 86.41, नाइट्रेट की 77.51, फॉस्फेट की 84.54 और डाइक्लोफेनेक की मात्रा 97.5 फीसदी तक कम पाई गई।
गिद्धों के लुप्त होने की बड़ी वजह डाइक्लोफेनेक
गिद्ध के लुप्त होने के पीछे भी वैज्ञानिक डाइक्लोफेनेक को ही जिम्मेदार मानते हैं। डाइक्लोफेनेक एक नॉनस्टेरॉइडल एंटी-इंफ्लेमेटरी ड्रग है, जो हल्के या मध्यम दर्द के इलाज में दी जाती है। यह जोड़ों के दर्द, सूजन अथवा गठिया पीड़ित मरीजों को काफी राहत देती है। प्रो. सुरनजीत के अनुसार पशुओं को दर्द निवारक दवाओं की काफी अधिक डोज दी जाती है। ऐसे बीमार पशुओं की 15-20 दिन के अंदर मौत होने पर अगर गिद्ध उसका मांस खा लेते हैं तो उनकी भी जान चली जाती है। कारण यह कि डाइक्लोफेनेक का हल्का डोज भी गिद्धों के लिए जहर सरीखा है।
अगले चरण में होगा नुकसान का आकलन
इविवि के वैज्ञानिकों के शोध में यह तो पता चल गया कि डाइक्लोफेनेक जैसी दर्द निवारक दवाएं पूरे इको सिस्टम को बुरी तरह प्रभावित कर रहीं हैं, लेकिन यह किस जीव को कितना नुकसान पहुंचा रही हैं, इसकी जानकारी शोध के अगले चरण में की जाएगी।