पिछले चुनाव में भाजपा के 22 पार्षद निर्वाचित हुए थे, तो करीब तीन दर्जन सीटों पर वह दूसरे स्थान पर रही। भाजपा इसी प्रदर्शन तथा मुस्लिम मतों के बिखराव के आधार पर 50 से अधिक वार्ड में जीत का दावा कर रही है, लेकिन ओमप्रकाश सभासद, झूलेलाल नगर, नैनी भदरी समेत कई वार्डों में भाजपा को अपने ही लोगों के विरोध का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में भाजपा का यह दावा कितना सच हो पाएगा यह 13 मई को ही पता चलेगा।
कांग्रेस को मिल सकता है सपा से जनता की नाराजकी का फायदा
पिछली बार कांग्रेस के 11 पार्षद चुने गए थे और संख्या बल के हिसाब से वह तीसरे स्थान पर रही। इनमें से नौ निवर्तमान पार्षदों या उनके परिजनों को कांग्रेस ने दोबारा मैदान में उतारा है। मुकुंद तिवारी की पत्नी, तसलिमुद्दीन, मुमताज, नफीस अनवर समेत कई इस बार भी मुख्य लड़ाई में हैं। इसके अलावा कांग्रेस को मुस्लिमों की सपा से नाराजगी का भी कुछ फायदा हो सकता है, लेकिन 50 पार्षदों का आंकड़ा कांग्रेस से भी दूर ही दिखाई दे रहा है। यही स्थिति पिछले चुनाव में तीन वार्ड में जीत हासिल करने वाली बसपा की भी दिख रही है।
इसके विपरीत पिछले चुनाव में कमलेश सिंह, आनंद घिल्डियाल, अखिलेश सिंह, अमरजीत यादव, दिलीप कुमार, रमेश मिश्र, शिवकुमार, जयेंद्र कुमार समेत 18 निर्दलीय पार्षद चुनकर सदन में पहुंचे थे। इसके अलावा डेढ़ दर्जन से अधिक सीटों पर निर्दलीय उम्मीदवार दूसरे स्थान पर रहे थे। इनमें से ज्यादातर इस बाद भी मैदान में हैं और मुख्य मुकाबले में हैं। ऐसे में इस बार भी सदन में निर्दलीयों की भूमिका बढ़ती दिख रही है।