इससे यह तय है कि उसने हत्या कोई योजनाबद्ध तरीके से नहीं की है। लिहाजा, याची का इरादा हत्या करने का नहीं है। वह भावावेश में आकर आत्म नियंत्रण खो दिया। लिहाजा, उसे आईपीसी की धारा 302 के तहत दोषी नहीं ठहराया जा सकता है। कोर्ट ने याची को आईपीसी की धारा 304 के तहत दोषी मानते हुए आजीवन कारावास की सजा को परिवर्तित करते हुए उसे 10 साल कर दिया और जुर्माने की रकम 40 हजार रुपये ही रखी।
कोर्ट ने यह भी कहा कि याची 10 साल की सजा काट चुका है। अगर वह जुर्माने की रकम नहीं जमा करता है तो उसे एक साल की सजा भुगतनी होगी। अगर, उसके खिलाफ कोई और आपराधिक मामला नहीं है तो उसे जेल से तुरंत रिहा किया जाए।