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बीएसएफ के शहीद जवान गिरीश कुमार शुक्ला यमुनापार में करछना के सुलमई गांव के किसान स्वर्गीय प्रभुनाथ शुक्ला के इकलौते बेटे थे। दादा शंकरनाथ की मृत्यु की सूचना पर उनकी तेरहवीं में शामिल होकर नौ दिन पहले ही घर से सीमा पर गए थे। 25 मई को ड्यूटी पर जाते समय मां और पत्नी से वादा कर गए थे कि इस बार लंबी छुट्टी लेकर घर आऊंगा। परिवारीजनों को क्या मालूम था कि इस बार वे खुद नहीं उनके शहीद होने की सूचना आएगी।
शहीद गिरीश कुमार शुक्ला किशोरावस्था में पिता की मौत के बाद धरवारा के लाल बहादुर शास्त्री इंटर कॉलेज से इंटर तक की पढ़ाई के बाद इलाहाबाद डिग्री कॉलेज में स्नातक की पढ़ाई के लिए दाखिला लिया था। इसी बीच 1990 में वह बीएसएफ में भर्ती हो गए। उनकी तैनाती पंजाब के फरीदपुर में थी लेकिन उनका तबादला श्रीनगर हो गया था। बीते मई माह में उनके दादा शंकरनाथ शुक्ला की मृत्यु हो गई तो वह छुट्टी लेकर घर आए थे। बीएसएफ में ही तैनात गिरीश का बेटा राघवेंद्र भी छुट्टी लेकर घर आया था। जिसके चलते गिरीश की बड़े बेटे के अलावा रिश्तेदारों और दोस्तों से भी मुलाकात हो हुई थी।
25 मई को घर से ड्यूटी जाते समय उन्होंने पत्नी कविता और मां इंद्रकली से वादा किया था अबकी बार लंबी छुट्टी लेकर आऊंगा। तब शायद उन्हें इस बात का अंदेशा भी नहीं था कि यह उनकी मां, पत्नी और बेटों से आखिरी मुलाकात होगी। मेघालय में तैनात गिरीश का बेटा राघवेंद्र भी 30 मई को घर से ड्यूटी पर गया था। घर से गिरीश पहले फरीदपुर(पंजाब) गए। वहां से वह कंपनी के साथ श्रीनगर जा रहे थे। तभी आतंकी हमले में शहीद हो गए। अनहोनी की खबर गिरीश के गांव वालों को मिली तो वे गम में डूब गए। गमजदा ग्रामीणों को शहीद की शहादत पर गर्व तो है लेकिन वीर शहीद जवान को खोने का गम भी है। शहीद गिरीश को जानने वालोें का कहना है कि वह बेहद मिलनसार और मृदुभाषी थे। छुट्टी पर घर आते तो परिवारीजनों के साथ गांव के लोगों और रिश्तेदारों से भी जरूर मिलते थे। हंसमुख स्वभाव के गिरीश शुक्ला की हर बात और उनके साथ बिताए पल को याद कर गमगीन ग्रामीणों का गला रूंध जाता है।
आतंकी हमले में शहीद गिरीश कुमार शुक्ला की शहादत पर करछना और सुलमई गांव के लोगों को गर्व है। गिरीश के शहीद होने की सूचना मिलते ही उनके आवास पर रिश्तेदारों और शुभचिंतकों समेत ग्रामीणों की भीड़ जुट गई। देर रात तक लोग उनकी वीरता और व्यवहार की चर्चा करते रहे। गांव के अधिकांश घर ऐसे रहे, जहां इस दु:खद सूचना के बाद खाना ही नहीं बना।