मिर्जा गालिब 1825 में आए थे प्रयागराज
कथाकार कालिया लिखते हैं कि गालिब इलाहाबाद के रास्ते बनारस गए थे। उस दौरान के अपने अनुभवों को उन्होंने अपने एक मित्र को लिखे खत में इस तरह किया है कि ''''अगर जन्नत का रास्ता इलाहाबाद से होकर जाएगा तो मैं जहन्नुम में जाना पसंद करुंगा''''...। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के उर्दू विभागाध्यक्ष रहे प्रो. अली अहमद फात्मी बताते हैं कि मिर्जा गालिब 1825-26 के दौरान यहां आए थे। फात्मी के मुताबिक तब वह बांदा होते हुए अपने एक मुकदमे के सिलसिले में कोलकाता जाते समय एक दिन के लिए यहां रुके थे।
तब मच्छरों ने उन्हें इतना तंग किया कि वह नाराज होकर यहां से लौटे। 1869 में गालिब के इंतकाल के सौ साल बाद 1969 में तत्कालीन मजिस्ट्रेट महमूद बट ने शहर की कई सड़कों का नामकरण शुरू किया था। उसी समय गालिब की सौवीं पुण्यतिथि मनाई गई और पुराने शहर में रोशनबाग तिराहे से जीटी रोड को जोड़ने वाली सड़क को मिर्जा गालिब का नाम दिया गया। इलाहाबाद विश्वविद्यालय की उर्दू विभागाध्यक्ष प्रो. शबनम हमीद बताती हैं कि गालिब प्रयागराज में यमुना किनारे जब रुके थे, तब वह किसी बात को लेकर आहत हो गए थे। अपने दोस्त गुलाम गौश बेखबर को लिखे खत में उन्होंने अपनी नाराजगी जाहिर की है।
शबनम के मुताबिक वह इलाहाबाद में कहां रुके थे, इसका सटीक विवरण कहीं नहीं मिलता, लेकिन यहां ठहरने के दौरान उनका अनुभव बहुत खराब रहा, जिसे उन्होंने फारसी में लिखे अपने पत्र में जाहिर किया है। खुल्दाबाद मोहल्ले में बैंक ऑफ बड़ौदा से अटाला की ओर जाने वाले रास्ते का नामकरण गालिब के नाम पर तब हुआ जब उनकी 100वीं पुण्यतिथि मनाई जा रही थी।